Om Prakash Kumar

Om Prakash Kumar Lives in Srinagar, NA, NA

मैं फूल हूँ, पतझड़ में खो जाऊँगा। पर, मेरी खुशबू वर्षो फ़िज़ा में रहेगी।।

https://www.youtube.com/channel/UCjTinqszgka0R9DpxhnoYgA

  • Popular Stories
  • Latest Stories

"#OpenPoetry मेरे पास आ जाओ ना, मेरे मन को भा जाओ ना, मुझे गले से लगा जाओ ना, मेरे अरमां जगा जाओ ना, मेरे दिल में समा जाओ ना, मेरे ग़म को भगा जाओ ना, मेरे सपनें सजा जाओ ना, मेरी दुनियाँ बसा जाओ ना, मेरी खुशियाँ बढ़ा जाओ ना, मुझे अपना बना जाओ ना, तुम, मेरे पास आ जाओ ना।।"

#OpenPoetry मेरे पास आ जाओ ना,
मेरे मन को भा जाओ ना,
मुझे गले से लगा जाओ ना,
मेरे अरमां जगा जाओ ना,
मेरे दिल में समा जाओ ना,
मेरे ग़म को भगा जाओ ना,
मेरे सपनें सजा जाओ ना,
मेरी दुनियाँ बसा जाओ ना,
मेरी खुशियाँ बढ़ा जाओ ना,
मुझे अपना बना जाओ ना,
तुम, मेरे पास आ जाओ ना।।

#OpenPoetry
#मेरे पास आ जाओ ना..✍💕

96 Love

"मेरे पहलू में आकर उनका बैठ जाना, महज़ एक इत्तेफाक़ था। पर कुछ ना बोलना और उनका चले जाना, इस दिल को नागवार गुजरा।।"

मेरे पहलू में आकर उनका बैठ जाना,
महज़ एक इत्तेफाक़ था।
पर कुछ ना बोलना और उनका चले जाना,
इस दिल को नागवार गुजरा।।

#पहलू

94 Love

"चलो ना, अब हम एक हो जाएँ। दिल बदलें, और नेक हो जाएँ।।"

चलो ना, अब हम एक हो जाएँ।
दिल बदलें, और नेक हो जाएँ।।

#नेक

89 Love
1 Share

"#OpenPoetry क्या जीत में, क्या हार में। हूँ भयभीत नहीं मझधार में। एक मुक़म्मल उनके इक़रार का, मन में प्यास जगाए बैठा हूँ। मैं आस लगाए बैठा हूँ।। क्या मेले में, क्या अकेले में। या रहूँ दुनिया के झमेले में। एक धुँधली-सी तस्वीर उनकी , दिल के पास लगाए बैठा हूँ। मैं आस लगाए बैठा हूँ।। क्या मन्नत में, क्या ज़न्नत में। या रहूँ मैं अपनी सल्तनत में। एक महफ़िल उनके प्यार की 'ओम', अपने आस-पास सजाए बैठा हूँ। मैं आस लगाए बैठा हूँ।।"

#OpenPoetry   क्या जीत में, क्या हार में।
हूँ भयभीत नहीं मझधार में।
एक मुक़म्मल उनके इक़रार का,
मन में प्यास जगाए बैठा हूँ।
मैं आस लगाए बैठा हूँ।।

क्या मेले में, क्या अकेले में।
या रहूँ दुनिया के झमेले में।
एक धुँधली-सी तस्वीर उनकी ,
दिल के पास लगाए बैठा हूँ।
मैं आस लगाए बैठा हूँ।।

क्या मन्नत में, क्या ज़न्नत में।
या रहूँ मैं अपनी सल्तनत में।
एक महफ़िल उनके प्यार की 'ओम',
अपने आस-पास सजाए बैठा हूँ।
मैं आस लगाए बैठा हूँ।।

#OpenPoetry
#मैं आस लगाए बैठा हूँ.. 😊💕😊

88 Love
1 Share

"#OpenPoetry अपनी क़लम से ख़ुदा का कलाम लिखता हूँ। आप सभी दोस्तों को दुआ-सलाम लिखता हूँ।। बचपन की वो सारी खुशियाँ जो मुझे नसीब हुई। अब जवानी के सारे रंज-ओ-ग़म तमाम लिखता हूँ।। जिस प्यारे से गाँव में गुज़रा है मेरा सारा बचपन। वहाँ की मिट्टी, पीपल, सुबह-ओ-शाम लिखता हूँ।। हसरत तो थी पूरी दुनियाँ को हासिल करने की। पर अब अपनी सिमटी दुनियाँ-जहान लिखता हूँ।। सज़ा मिली मुझे क्योंकि मैंने पत्थर को पत्थर कहा। इसलिए अब इस ज़मीन को मैं आसमान लिखता हूँ।। जीवन-पथ पर मिले सभी अपने भी, पराये भी। उन सभी के सम्मान को मैं एक-समान लिखता हूँ।। अब तो आरज़ू है उम्र भर जिनके साथ चलने की। मैं उनकी हँसी और सभी मस्तियाँ तमाम लिखता हूँ।। जिसके खोखले वादों में पूरी जनता बहक गई। उस सियासत को चालाक, जनता को नादान लिखता हूँ।। दम तोड़ रहे नौनिहालों पर भी जो मौन है, ओम। उस गंदी सियासत का मैं काम-तमाम लिखता हूँ।।"

#OpenPoetry   अपनी क़लम से ख़ुदा का कलाम लिखता हूँ।
आप सभी दोस्तों को दुआ-सलाम लिखता हूँ।।

बचपन की वो सारी खुशियाँ जो मुझे नसीब हुई।
अब जवानी के सारे रंज-ओ-ग़म तमाम लिखता हूँ।।

जिस प्यारे से गाँव में गुज़रा है मेरा सारा बचपन।
वहाँ की मिट्टी, पीपल, सुबह-ओ-शाम लिखता हूँ।।

हसरत तो थी पूरी दुनियाँ को हासिल करने की।
पर अब अपनी सिमटी दुनियाँ-जहान लिखता हूँ।।

सज़ा मिली मुझे क्योंकि मैंने पत्थर को पत्थर कहा।
इसलिए अब इस ज़मीन को मैं आसमान लिखता हूँ।।

जीवन-पथ पर मिले सभी अपने भी, पराये भी।
उन सभी के सम्मान को मैं एक-समान लिखता हूँ।।

अब तो आरज़ू है उम्र भर जिनके साथ चलने की।
मैं उनकी हँसी और सभी मस्तियाँ तमाम लिखता हूँ।।

जिसके खोखले वादों में पूरी जनता बहक गई।
उस सियासत को चालाक, जनता को नादान लिखता हूँ।।

दम तोड़ रहे नौनिहालों पर भी जो मौन है, ओम।
उस गंदी सियासत का मैं काम-तमाम लिखता हूँ।।

#OpenPoetry
#अपनी कलम से... ✍

84 Love