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रामलीला

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काश ,,,,!!
ऐसा हो जाए,,,👏
👶बाल्यावस्था का प्रेम
👴वृद्घावस्था तक साथ निभाए,,,

हलीमा😋

vrdhawastha vs balyawasth
#रामलीला

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ये तस्वीरें बेहद ख़ास इसलिए भी हैं क्योंकि इनमें सिर्फ उसका ही नहीं मेरा बचपन भी सांस ले रहा है ... वो बचपन जब हर बात पर बड़ी आसानी से विश्वास हो जाता था ... इस बात पर भी कि ये जो चेहरे रोज हमारे मोहल्ले से निकलते हैं ये सच्ची - मुच्ची वाले भगवान ही हैं। ये हमें सब कुछ दिला सकते हैं और हर मुश्किल से बचा सकते हैं , इसलिए हम बच्चे हाथ जोड़कर , सर झुकाकर उन दिनों ना जाने क्या - क्या इन्हीं के सामने माँग लेते ... वो खिलौना जो मेले में पसंद आया हो लेकिन मुट्ठी में उतने पैसे ही ना हो , वो दोस्ती जो पिछली शाम दोस्त से लड़ाई करके टूट गयी हो , वो ड्रेस जो किसी दुकान पर टँगी देखी हो , वो गुल्लक जो कई दिनों से सिक्के डालने के बाद भी भरी ना हो , वो ग्रह कार्य ( होम वर्क ) जो पूरा करना भूल गए हैं ...और ना जाने क्या - क्या ...😊 तब सारी शिकायतें सारी फरमाइशें 10 - 12 दिन तक इन्हीं से होतीं थी और विश्वास बढ़ता भी , तब - जब पापा रात घर आते हुए वो खिलौना हाथ में ले आते , या दूसरे दिन वो रूठे हुये दोस्त के पास आकर बैठ जाता और बस भर मुस्कुरा देता ... क्योंकि " सॉरी " जैसा कोई शब्द मेरे वाले बचपन में आया ही नहीं था ...
बहुत भोला - भाला सा था वो बचपन जब मेरी आँखें इन चेहरों के पीछे मौहल्ले या आसपास के लड़के नहीं ,साक्षात भगवान देखता था ...

आज वृत्तांत की आंखें भी उनमें उसके भाँनजी (भगवान ) ही देख रही थीं ... और मेरी तुच्छ आँखें उनमे " इंसान " । कितना कुछ मर चुका है मेरे अंदर ... उसका बचपन हर रोज़ एहसास कराता है ...

PS - कृपया इसमें लिखे शब्दों के एक बचपन मन की बातें समझकर पढ़िए ... किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचेगी :)

जसवंतनगर#मेला #रामलीला #बचपन #यादें

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"रामलीला"
शाम 4 बजते ही कस्बे के बच्चे घर के चबूतरे पर जाने की जिद करते ...और हम जैसे शैतान बच्चे दोपहर के 2 बजते ही सीधे उस मंदिर का रुख करते जहाँ दरअसल राम ,सीता ,लक्ष्मण का श्रंगार किया जाता था ... घर, मंदिर के पास था तो जाहिर है " राम " के साक्षात दर्शन कौन नहीं करना चाहेगा ... हम बच्चों के लिए बचपन में राम स्वरूप धारण करने वाला वो साधारण सा लड़का भगवान बन जाता ... मन की सारी मुरादे उसी से माँगते ... फिर क्या था ... उसके हर बार गली से गुजरते ही हम सब बच्चे मिलकर " राम जी - राम जी " कर चिल्लाते ... राम - सीता का " विमान " जब हर शाम आँखों के सामने से गुजरता तो बस उसके पीछे जाने की सोचते ... पर मोहल्ले की सुरक्षा से बंधे हम बच्चे ऐसा कभी नहीं कर पाए ... ;-)
दशहरा भी खास था ... इसलिए नहीं , कि उस दिन रावण मरता था ... बल्कि इसलिए कि राम - रावण के युद्द के समय उनका तीर हाथ लग जाये ... गलती से अगर तीर मिल गया तो हमारे गुरुर का ठिकाना ही नहीं रहता ...
जैसे " तीर मारना " बड़ी बात है वैसे ही हम बच्चों को वो "तीर मिल जाना" बड़ी बात थी :)

बचपन में रामलीला दरअसल हम बच्चों के लिए " मेले वाले दिन " हुआ करते थे ... जिसके शुरू होने से पहले ही पैसे जोड़ने की जुगाड़ की जाती ... ज्यादा नहीं ... बस 10 - 20 रुपए मिलते होंगे शायद उस समय ... जो हम बच्चों के झूला झूलने ,सोफ्टी खाने ,गोलगप्पे खाने के लिए काफी थे ...
सब बच्चे एक साथ मेला जाते इस सीख के साथ कि, सब एक दुसरे का हाथ पकड़े रहना ;) मेले में बड़ी दुकानों पर सजी महँगी चीजों से हमारा कोई वास्ता नहीं था ... मन लेना भी चाहे तो मन को समझा लेते " पापा के साथ आकर लेंगे "
हजारों की भीड़ में जाने पहचाने चेहरे ,लाऊड स्पीकर पर बजते पुराने गाने और कभी - कभी बच्चे खोने की सूचना , कानों में पड़ती रामलीला वाली प्रचलित ध्वनि जो कस्बे का हर व्यक्ति पहचानता है ... यही माहौल होता था पूरे 10 दिन ...
शायद इसीलिए पित्र पक्ष के बाद आये हुए ये दिन मैं कभी नहीं भूलता.. समय अपने साथ एक खुशबू लिए होता है जो वक़्त के साथ महसूस होती है ... ये भी वो समय है जब कस्बे का कोई भी व्यक्ति " रामलीला " होने का अहसास अन्तर्मन से कर सकता है भले ही वो क्यूँ ना जसवंतनगर से कोसों दूर हो :-) इस बार बिल्कुल मेरी तरह !!!
पर इन्टरनेट की दुनियाँ ने अब दूरी मिटाकर सब कुछ पास ला दिया है तो हम जैसे लोग कोसों दूर बैठकर भी उसे महसूस कर पाते हैं ...
खैर... मेरा क़स्बा " जसवंतनगर " भले ही गूगल मैप के पैमानों पर छोटा हो पर " रामलीला " को लेकर ये बड़ा स्थान रखता है ... भारत में शायद ही कहीं " मैदानी रामलीलाओं " का आयोजन अब किया जाता हो...राम जीवन की हर लीला का मंचन 10 दिन ,खुले मैदान में संवादों के साथ कराये जाने की ये परंपरा लगभग 150 साल पुरानी हो चुकी है ... जिसकी ख्याति की खुशबू अब विदेशों में भी है ... रामलीला " के इतिहास ,उसमे आये परिवर्तनों पर शोध पत्र भी लिखे जा रहे हैं ...जो जसवंतनगर से वास्ता रखने वाले हर शख्स को गौरान्वित करता है ...

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