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चूल्हे पे चढ़ी हांडी , फ़िर तुमको बुलाती है , यादों

चूल्हे पे चढ़ी हांडी , फ़िर तुमको बुलाती है ,
यादों की  आँच पर माँ ,अरमान पकाती है ,

उड़ गए जो नीड़ के पँछी ,फ़िर लौट आएंगे,
इस ठंडे पड़े चूल्हे से,महक उनकी आती है,

क्यों कर गए उदास,खनकते नही बर्तन भी अब,
आ जाओ ज़िगर के टुकड़ों ,माँ ख़ीर बनाती है,

तुम थे  तो  इस  घर की हर  दीवार बोलती थी ,
बिन तुम्हारे तो झींगुर की,आवाज़ भी कम आती है।।

पूनम आत्रेय

©poonam atrey
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