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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 11

।।श्री हरिः।।
5 - भक्ति-मूल-विश्वास

'पानी!' कुल दस गज दूर था पानी उनके यहाँ से; किंतु दुरी तो शरीर की शक्ति, पहुँचने के साधनपर निर्भर है। दस कोस भी दस पद जैसे होते हैं स्वस्थ सबल व्यक्ति को और आज के सुगम वायुयान के लिये तो दस योजन भी दस पद ही हैं; किंतु रुग्ण, असमर्थ के लिए दस पद भी दस योजन बन जाते हैं - 'यह तो सबका प्रतिदिन का अनुभव है।

'पानी!' तीव्र ज्वराक्रान्त वह तपस्वी - क्या हुआ जो उससे दस गज दूर ही पर्वतीय जल-स्त्रोत है। वह तो आज अपने आसन से उठने में भी असमर्थ है। ज्वर की तीक्ष्णता के कारण उसका कण्ठ सूख गया है। नेत्र जले जाते हैं। वह अत्यन्त व्याकुल है।

'पानी! ओह, पानी देने भी आज रामसिंह नहीं आया!' उसने पड़े-पड़े ही एक ओर देखा। उसके आसन के पास पड़ा तूंबा जलरहित है और अभी तो कहीं किसी के आने की आहट नहीं मिलती।

'पानी!' पास की पहाड़ी पर कुछ घर हैं पर्वतीय लोगों के। उन भोले ग्रामीणों की श्रद्धा है इस तपस्वी में। उनमें से एक व्यक्ति रामसिंह तो प्राय: दिन में दो-तीन बार यहाँ हो जाता है और स्थान स्वच्छ कर जाता है। जल भरकर रख जाता है। कोई और सेवा हुई तो उसे भी कर जाता है। इन महापुरुष की सेवा करने का उसे सौभाग्य मिलता है, यही क्या कम है।

रामसिंह के अपने भी तो कार्य है। उसके पशु हैं बाल-बच्चे हैं, कुछ खेत हैं और फिर कल रात उसे भी ज्वर हो गया था। उसे आज आने में देर हो रही है, इसमें कोई अद्भुत बात तो नहीं है।

'पानी!' तपस्वी का कण्ठ सूख रहा है। उसकी बेचैनी बढ रही है। उसे बहुत तीव्र ज्वर है और ज्वर की प्यास - 'रामसिंह नहीं आया?' दो क्षण पश्चात ही उसने इधर-उधर नेत्र घुमाये।

'पानी! प्यास! रामसिंह!' लगा तपस्वी मूर्छित हो जायगा। उसका गौरवर्ण मुख ज्वर के कारण लाल हो रहा है। उसके अरुणाभ नेत्र अंगार-से जल रहे हैं।

'रामसिंह! तो तू रामसिंह का चिंन्तन और उसकी प्रतीक्षा कर रहा है!' पता नहीं क्या हुआ, आप चाहें तो इसे ज्वर की विक्षिप्तता कह सकते हैं, आपको मैं रोकता नहीं। 'तू रामसिंह के भरोसे यहां आया था। धिक्कार है तुझे, नीलकण्ठ!'

हाँ, तपस्वी का नाम नीलकण्ठ है। यह दूसरी बात कि उसे यहां कोई इस नाम से नहीं जानता। सच तो यह कि यहाँ कोई उसका नाम या परिचय जानता ही नहीं। जानने-पूछने का साहस नहीं हुआ किसी को। किंतु नाम की बात छोड़िये - तपस्वी सम्भवत: ज्वर से उन्मत्त हो गया है। वह बारंबार इस कठोर भूमिपर मस्तक पटक रहा है। अपने मुखपर तमाचे मारता जा रहा है - 'तू अब रामसिंह की प्रतीक्षा करने लगा है। तुझे अब आशुतोष प्रभू का भरोसा नहीं रहा और तू चला है उपासना करने? उपासक बना बैठा है तू इस अरण्य में।'

नेत्रों से अश्रुधारा चल रही है। मुख लाल-लाल हो गया है; किंतु विक्षिप्त हो उठा है वह तो।
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आज जिसे नीलकण्ठ कहते हैं, स्वर्गाश्रम से लगभग सात-साढे सात मील दूर मणिरत्न कूट पर्वत के चरणों में चारों ओर पर्वतमालाओं से घिरा स्थल तो वही था; किंतु तब उसका कोई नामकरण नहीं हुआ था। बात जो शताब्दियों पूर्व की है यह।

नीलकण्ठ आज चौदह वर्ष से कुंजी भगत की निष्ठा से स्वच्छ है। उससे पूर्व आज के लोगों ने ही देखा है कि वहां प्राय: वन्यतरुओं के पत्तों की राशि सर्वत्र स्वच्छन्द पड़ी रहती थी। बाबा रामझरोखादासजी की साज-सज्जा कहाँ थी और कहाँ थी तब नैपाली कोठी, धर्मशाला और दुकानें।

तब की बात, जब ये पाकर-अश्वत्थ के युम्मतरु भी नहीं थे। केवल दोनों जलधाराएँ थी, जो आज भी नीलकण्ठ के चरणों को दो ओर से धोती एक में मिलकर आगे बढ जाती हैं। तब पाइप लगाकर धारा को नल का रूप देने की व्यवस्था नहीं थी। तब तो उनमें पत्तों की राशि पड़ी रहती और सड़ा करती थी।

आज भी नीलकण्ठ में यदाकदा रीछ रात में आ जाते हैं। शेर और चीते वहाँ से सौ-दो-सौ गज तक पर्यटन कर
जाते हैं। उस समय तो वन्य पशुओं का आवास था नीलकण्ठ। केवल दिन में पर्वत-शिखरों पर स्थित पर्वतीय जन अपने पशुओं को लेकर वहाँ आते थे।

ऐसे अरण्य में एक दिन एक लंबे दुबले गौरवर्ण तरुण ने पता नहीं कहां से, आकर आसन लगा दिया। वह वहीं आ जमा, जहाँ आज भगवान् नीलकण्ठ विराजमान हैं। उस समय तो वहाँ ठिकाने की समतल भूमि भी नहीं थी।

बिखरे घुंघराले रूखे केश, प्रलम्ब बाहु, अरुणाभ सुदीर्घ नेत्र - पता नहीं क्या था उस तरुण में कि वन्य पशुओ ने प्रथम दिन से ही उसे अपना सुहृद मान लिया। भल्लूक शिशु रात्रि में कभी-कभी उसके तूंबे का जल लुढका दिया करते थे - इससे अधिक उसे किसी ने कभी तंग नहीं किया। उसके समीप शेर या चीते के जोड़े रात्रि में चाहे जब निंशक आ बैठते थे।

तूंबा और कौपीन - इनके अतिरिक्त उसके पास तो कंद खोदने के लिए भी कुछ नही था। किंतु जो इस प्रकार सर्वात्मा पर अपने को छोड़ देता है, विश्वम्भर उसकी उपेक्षा कर दे तो उसे विश्वम्भर कहेगा कौन? पर्वतीय जन उसके आस-पास का स्थान आकर स्वच्छ कर जाने लगे और उनमें से कभी किसी और कभी किसी की गाय का दूध तपस्वी की स्वीकृति पाकर सफल हो जाता था। दुध के अतिरिक्त तपस्वी ने कभी कुछ लिया नहीं।

ऋतुएँ आयी और गयी। तपस्वी क्या करता है - भला, भजन-साधन को छोड़कर तपस्वी और क्या करेगा? इन बाबाजी लोगों के अटपटे साधन कहाँ पर्वतीय जनों की समझ में आते है। हाँ, प्रारब्ध का भोग तो सभी को भोगना पड़ता है। एक वर्ष में जब जल मलिन हुआ, पत्ते सड़े, मच्छरों का अखण्ड सकींर्तन अन्य वर्षों से बहुत बढ गया और पिस्सुओं की संख्या भी पर्याप्त हो गयी, एक दिन तपस्वी रुग्ण हो गया। उसे हड्डी-हड्डी कम्पित कर देने वाला शीत लगा और ज्वर हो गया।

ज्वर आया और आता रहा। कई दिन से तपस्वी इतना अशक्त हो गया है कि अपने आसन से खिसक भी नहीं सकता। पास के पर्वत शिखर पर कुछ घर हैं। उनमें एक घर रामसिंह का है। रामसिंह तपस्वी के लिए जल
भर जाता है, स्थान स्वच्छ कर जाता है, कुछ आवश्यक सेवा-कार्य कर जाता है; किंतु रामसिंह के भी बाल-बच्चे हैं, पशु, खेत हैं और कल रात उसे भी ज्वर हो गया। उसे आने में देर होना कहाँ कैसे अनुचित या अस्वाभाविक कहा जा सकता है।
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'आप यह क्या कर रहे हैं प्रभु!' रामसिंह स्वयं खिन्न है कि वह देर से आ सका। वह आज अपनी मैली मोटी चद्दर पूरे शरीर पर लपेटे है।

'रामसिंह!' तपस्वी ने देखा उसकी ओर और जैसे उसकी विक्षिप्तता शिथिल हो गयी। उसके अश्रु रुक गये। किन्तु उसका प्यास से सूखा कण्ठ भरा-भरा था - तुमको भी ज्वर हो गया दीखता है। तुम तत्काल घर लौट जाओ।'

'जल रखकर मैं अभी चला जाता हूँ!' रामसिंह ने तपस्वी के चरणों पर मस्तक रखा और फिर तूंबा लेने बढा।

'उसे छूओ मत!' तपस्वी ने रोक दिया। 'मुझे जल नहीं चाहिये। दूसरे लोंगों से कह देना, आज इधर कोई न आये।'

'जो आज्ञा, प्रभु!' सरल रामसिंह ने फिर प्रणाम किया। और वह लौट चला। उसने तो साधु-संतों की आज्ञा मानना ही सीखा है। उसे बात का सीधा अर्थ ही समझ में आता है। महात्मा लोगों के चित्त का क्या ठिकाना - वे पता नहीं कब कैसे रहना चाहते हैं। उनकी आज्ञा बिना प्रतिवाद के मान लेनी चाहिये, यही जानता है यह रामसिंह।

'मैं रामसिंह की प्रतीक्षा कर रहा था और वह आया।' रामसिंह के पीठ फेरते ही तपस्वी धीरे-धीरे बुदबुदाया। 'मेरे प्राण आशुतोष प्रभु की प्रतीक्षा करेंगे और वे दयामय नहीं पधारेंगे। परन्तु इस अधम नीलकण्ठ के प्राणों ने उनकी प्रतीक्षा की कहाँ है।'

'पानी!' तपस्वी के होठों से अब यह शब्द नहीं निकल रहा था; क्योंकि उसने तो अब दाँत-पर-दाँत दबा लिए थे। किंतु उसके भीतर ज्वर का भीषण दाह - पानी की माँग अत्यन्त प्रबल हो चुकी थी। उसके प्राणों में
छटपटाहट चल रही थी।

'अब तो श्रीगंगाधर के सरोजारुण करों से गंगाजल पीना है! तपस्वी का संकल्प स्थिर हो गया। उसने दैहिक व्यथा की सर्वथा उपेक्षा कर दी - 'वह यहाँ प्राप्त हो या कैलास के दिव्य धाम में।'

जब कोई हठी इस प्रकार हठ कर बैठे, किसी के प्राण सचमुच उस चंद्रमौलि के लिए ही आकुल हो उठें, कोई उसी विश्वनाथ पर भरोसा करके अड़ जाय - वह अपार करुणार्णव वृषभध्वज उससे पल भर भी दुर कहाँ रहता है?

रामसिंह कठिनता से अपने घर के मार्ग में चौथाई दूर गया होगा - अरण्य वृषभ के घंट से निकली दिव्य प्रणव-
ध्वनि से पूरित हो गया। बाल शशांक की मृदु किरणें मूर्छितप्राय तपस्वी के भालपर पड़ी और साथ ही पड़ा एक अमृतस्यन्दी कर। विभूतिभूषण कृत्तिवास प्रभु स्नेहपूर्वक देखते हुए कह रहे थे - 'वत्स?'

ज्वर, ज्वर की ज्वाला और तृषा - 'अरे, उन श्रीगंगाधर के सम्मुख तो कराल काल की महाज्वाला भी शान्त हो जाती है। दूर भागती है त्रिताप की ज्वाला उन पार्वतीनाथ के श्रीपदों से। तपस्वी के प्राण आप्लावित हो गये। उसने नेत्र खोले और वैसे ही मस्तक धर दिया उन सुरासुरवन्दित श्रीचरणों पर।

'वत्स! गंगाजल लाया हूँ मैं।' तपस्वी को स्तवन करने का समय नहीं मिला। श्रीगंगाधर के करो में उनका सुधावारिपूरित खप्पर आगे बढ चुका था। तपस्वी ने मस्तक उठाया और प्रभु ने खप्पर उसके अधरों से लगा दिया।
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'यह तो दिव्य भूमि है!' भगवान् आदि शंकराचार्य जब उत्तराखण्ड की ओर पधारे, ऋषिकेश आनेपर पता नहीं किस प्रेरणा से वे गंगा पार होकर चलते गये पर्वतों में और वर्तमान नीलकण्ठ स्थानपर पहुँचे। उन्होंने दोनों पर्वतीय लघु जलधाराओं के संगम के समीप सिद्धवटी (वट, पीपल, पाकर का सम्मिलित तरु) देखा और प्रसन्न हो गये। उन्होंने आचमन किया जल में और सिद्धवटी के समीप आसीन हुए।

'यहाँ तो भगवान् नीलकण्ठ का स्वयम्भूलिंग है।' सहसा भगवान् शंकराचार्य ने नेत्र खोले और आसन से उठ खड़े हुए। उनके निदेंश पर तरुमूल के समीप एकत्र मृत्तिकाराशि साथ के सेवकों ने दुर की और उसके नीचे से श्यामवर्ण भगवान् नीलकण्ठ का बाणलिंग प्रकट हो गया। आदि शंकराचार्य के करों से ही प्रथमार्चन हुआ नीलकण्ठ भगवान का। तभी से यह क्षेत्र 'नीलकण्ठ' कहा जाने लगा।

'अपने परम प्रिय आराधक के लिए प्रभु यहाँ व्यक्त हुए और लिंगरूप में उसी की श्रद्धा को स्वीकार करके सदा के लिए स्थित हो गये।' भगवान् शंकराचार्य ने साथ के जनों को उस समय सूचित किया था।
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हम तो नीलकण्ठ में ग्रीष्मवास करने गये थे। हमें एक संत ने बसाया था - 'भगवान् नीलकण्ठ की स्थापना आदि - शंकराचार्य के करों से हुई है।'

स्थापना की बात में कुछ अन्तर था। वह स्थापना नहीं, अभिव्यक्ति और प्रथमार्चन था। हमें बाबा रामझरोखादासजी ने बताया था - 'भगवान् नीलकण्ठ स्वयम्भूलिंग हैं।'

'वह ऊपर शिखर पर भुवनेश्वरी का मन्दिर है।' एक पर्वतीय भाई ने दिखाया था। अपने अनन्य विश्वासी के समीप आकर जब नीलकण्ठ प्रभु वहीं स्थित हो गये, तब अपने उन आराध्य का सतत दर्शन करती देवी भुवनेश्वरी समीप के पर्वतशिखर पर विराजमान हों, यह सर्वथा स्वाभाविक है।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 11

।।श्री हरिः।।
4 - आस्तिक

'भगवान भी दुर्बल की पुकार नहीं सुनते!' नेत्रों से झर-झर आँसू गिर रहे थे। हिचकियाँ बंध गयी थी। वह साधु के चरणों पर मस्तक रखकर फूट-फूट कर रो रहा था।
'भगवान् सुनते तो है; लेकिन हम उन्हें पुकारते कहाँ हैं।' साधु ने स्नेहभरे स्वर में कहा। विपत्ति में भी भगवान को हम स्मरण नहीं कर पाते, पुकार नहीं पाते, कितना पतन है हमारे हृदय का।'

'लेकिन प्रभु! वे सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, दयामय कहे जाते हैं।' उसकी वाणी में अपार वेदना थी। 'मेरे घर के तो सभी नित्य प्रातः-सायं पूजा करते थे।'

'लेकिन भाई! किसी मूर्ति पर दो बूंद जल डाल देना, दो फूल चढा देना, दो-चार पद्य या श्लोक मुख से बोल देना ही तो पूजा नही है। पूजा तो तब होती है, जब हम भगवान को सचमुच माने।' साधु महाराज के स्वर में कोमलता के साथ उलाहना था।

'तो क्या मैं भगवान को मानता नहीं?' उतने मस्तक उठाया।

'भगवान सर्वव्यापक हैं, सर्वसमर्थ हैं, यह हम सब जानते मानते हैं।' साधु ने उसी शान्ति से कहा - 'लेकिन हम झूठ बोलते हैं, दुसरों को धोखा देते हैं और अनेक पाप करते हैं। संकट में घबरा जाते हैं - इतना घबरा जाते हैं कि भगदान को पुकारने का हमें स्मरण तक नहीं रहता।'

'संकट भी संकट जैसा हो तब!' अपने नेत्र पोंछने जैसी भी उसमें शक्ति नहीं थी। गला रूंधने से अटक-अटक कर वह बोल पा रहा था - 'महाप्रलय एक साथ ही सिर पर टुट पड़े तो किसका चित्त ठिकाने रहे? कोई उस समय क्या करता है, यह क्या सोच-समझकर किया जा पाता है?'

'कोई क्या मानता है, क्या जानता है, किसपर विश्वास करता है, इसका उसी महासंकट में तो पता लगता है।' साधु ने स्थिर गम्भीर स्वर में कहा - 'एक नन्हें बच्चे को जब वह माँ से दूर हो, डराकर देखो। वह जानता है माँ दूर है, आ नहीं सकती, उसकी सहायता नहीं कर सकती; किंतु वह भागेगा पीछे, कंकड-पत्थर तुम्हें मारने की सुध उसे पीछे आयेगी, वह पहले पुकारेगा - 'माँ! माँ!!' और हम, तो जानते हैं कि सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् परमात्मा हमारे पास है। हमें वह आधे क्षण के करोड़वें भाग में बचा सकता है। यदि हम हृदय से परमात्मा को मानें, हम आस्तिक हों तो उसे विपत्ति में पुकारना भूल जायें, क्या यह बन सकता है।'

उसने मस्तक झुका दिया। उसका शरीर जैसे ऐंठकर शिथिल हो गया हो। उसकी वाणी खिन्न, हीन, निराश अन्तिम स्वास लेते प्राणों की वाणी-जैसी थी - 'परमात्मा!'

'जब तुम्हारे पीछे तुम्हारे महाराज खड़े हों - भले तुमने उन्हें देखा न हो पर जान गये हो कि वे तुम्हारे पीछे दबे पैर चुपचाप चले आ रहे हैं - कोई तुम्हें एक सहस्त्र स्वर्णमुहरें दे तो तुम उसके लोभ में पड़कर उस समय कोई भेद बता सकोगे? तुम कोई भी बुराई कर सकोगे उस समय? कोई कर्तव्य तुम्हारे सामने हो तो उसमें तुमसे ढिलाई होगी? तुम्हारा कोई शत्रु तलवार लेकर तुम्हारे सामने आ खडा हो तो तुम जानते हो कि तुम क्या करोगे उस समय?' साधु ने बड़ी गम्भीरता से प्रश्न किये।

'मेरे उदार महाराज!' उसने एक बार मस्तक झुकाया। या तो शोक के वेग में साधु की पूरी बात उसने सुनी नहीं या उनका उत्तर देना उसे उचित नहीं जान पड़ा। वह केवल अन्तिम प्रश्न के उत्तर में बोला - 'मेरे महाराज मुझसे कुछ दूर भी हों - इतनी दुर कि मैं उन्हें पुकार संकू, मुझे किसका भय। मुझे आवश्यकता क्या कि मैं अपनी तलवार की मूठ पर हाथ रखूं। कोई कैसा भी चिढ आवे, मैं पीछे मुख घुमाकर देख लूं तो उसकी नानी मर जायगी।'

'निखिल ब्रह्माण्डनायक उदार-चक्रचूड़ामणि परमात्मा तुम्हारें साथ हैं और फिर भी तुम्हें भय लगता है, घबराहट होती है, इसका तो यही अर्थ है न कि परमात्मा है और सर्वत्र है, इस बात का हृदय में पूरा निश्चय नहीं!' साधु कहते जा रहे थे - 'आस्तिक पाप नहीं कर सकता, कर्तव्य में प्रमाद नहीं कर सकता और भयभीत नहीं हो सकता। आस्तिकता की कसौटी ही है निष्पाप, कर्तव्यनिष्ठ एवं निर्भय होना। आस्तिकता री पूजा ही यथार्थ पूजा होती है।'

'महाराज! मैं आस्तिक नहीं हूँ! मुझमें ऐसा विश्वास कभी नहीं रहा है।' वह बोल नहीं रहा था उसके प्राण चीत्कार कर रहे थे - 'परमात्मा!'
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वह राजपूत है। दूसरे राजपूतों के समान ही वह भी हैं; किंतु दुसरों के बहुत-से दोष उसमें नहीं हैं। वह यहाँ के ठिकानेदार का अंगरक्षक है। उनका विश्वासी सेवक है। अपने ठिकानेदार को वह 'महाराज' कहता है, उसके तो महाराज ही हैं। बहुत स्नेह है उसपर उनका।

राजस्थान के राजपूतों में कुछ दोष भी हैं। दोष किसमें नहीं हैं। वह अपने को निदोंष कहाँ कहता है, किंतु आप उससे शपथ ले सकते हैं कि उसने कभी मांस या मदिरा छुआ हो। एक और दोष - यह शेष भी राजाओं, ठिकानेदारों में जहाँ-तहाँ मिलता ही था और उनके पार्श्वचर लोगों का उसमें सम्मिलित हुए बिना निर्वाह नहीं था। उसके सामने भी बात आयी थी - केवल एक बार बात और उसने बिना सोच-संकोच के तलवार खींच ली थी - 'दुसरों की बहिन-बेटी तो मेरी बहिन-बेटी है!' उसका उस दिन का वह रौद्र रूप - किसको मरना था जो उससे फिर कोई ऐसी-वैसी बात कहता।

कुलपरम्परा से उसे ठिकानेदारजी की सेवा मिली है, शूरता मिली है और आस-पास के राजपूतों से सर्वथा भिन्न आचार मिला है। उसके पिता जब मरण-शय्या पर थे, उन्होंने कहा था - 'बेटा! भगवान् नारायण हमारे कुलदेवता हैं। मांस और शराब हमारे कुल में किसी ने छुआ नहीं है। यह खड्ग यह तो माँ भवानी का साक्षात रूप है। यह तेरे पिता-पितामह के हाथ में रहता आया है। इसकी लज्जा रखना। स्वामी की रक्षा में प्राण जाते हों तो जायें, कुल को कलंक मत लगाना।'

उसने पिता की शय्या के पास बैठकर उस कुलपरम्परा से प्राप्त खड्ग को मस्तक से लगाकर शपथ ली। प्राण-त्याग के अन्तिम क्षण में उससे पिता ने कहा था - 'एक बात और स्मरण रखना। नारी की गौरव-रक्षा - यह राजपूतका परम धर्म। धर्म से बड़ा कोई नहीं होता बेटा! प्राण भी नहीं और स्वामी भी नहीं। धर्म तो साक्षात् भगवान नारायण का स्वरूप है।'

आज आप उसकी व्यथा उसकी दारुण पीड़ा समझ नहीं सकेंगे। राजपूत के जिस परम धर्म की रक्षा के लिए
नारी के गौरव को उज्जवल रखने के लिए उसने एक दिन अपने उस स्वामी के सम्मुख भी तलवार खींच ली थी, जिनके लिए अपना मस्तक काटकर धर देने में भी उसे संकोच नहीं, उसका वही परम धर्म आज नष्ट हो गया
है। आज उसके सामने उसका वह परम धर्म .......... वह विचार करनेमें भी असमर्थ हो रहा है।

'परमात्मा! परमात्मा!! उसने कभी किसी नारी की ओर वासना भरी दृष्टि नहीं उठायी। किसी की वासना को 'हूँ' कहकर भी उसने समर्थन नहीं किया। आज उसके घर की नारी - उसकी बहिन - ये नरपिशाच.......... परमात्मा!' वह जैसे उन्मत्त ही गया है। उसे न पृथ्वी दीखती है, न आकाश। सारी दिशाएं जैसे घूम रही है।

भारत का विभाजन - पता नहीं कितने अनर्थ किये इस विभाजन ने। उसका गाँव सीमा का गाँव बना और सीमा के गाँव की जो दुर्दशा होती है, उसे भी क्या बताना पड़ेगा? दो राष्ट्रों में मैत्री हो, सन्धि हो, तब भी सीमा के ग्रामों पर तो रात-दिन कोई-न-कोई संकट चढा ही रहता है और जहाँ इतना उपद्रव, इतनी कटुता, इतनी आपाधापी हो.........।

था वह घर पर ही। किसी का घर पर रहना क्या अर्थ रखता है? बहुत छोटा गाँव है उसका। थोड़े से लोग रहते हैं। वे सावधान भी होते तो कुछ होना-जाना नहीं था और उस समय तो सब रात्रि में अपने-अपने घरो में सोये पड़े थे। तड़ा तड़ गोलियाँ चलने लगीं, चिल्लाहट सुनायी पड़ने लगी। वह चौंककर उठा तो बड़ी भारी भीड़ ने उसका गाँव घेर रखा था। कई घर धांय-धांय करके जल रहे थे। वह अपनी तलवार लेकर दौड़ पड़ा। कुछ और भी राजपूत दौड़े होंगे; किंतु सीमा की दूसरी ओर से जो उपद्रवी चढ आये थे, उनकी संख्या बहुत बड़ी थी। राजपूत गिने-चुने थे। कुछ भी हो, जब मरना ही है सब सम्मुख युद्ध में मरने से राजपूत पीछे क्यों हटे। वह जैसे आँखें बन्द करके टूट पड़ा था। उसे पता नहीं कि पीछे वहाँ क्या हुआ। वह दूसरे दिन, दिन चढे नेत्र खोल सका था। कोई उसे अपने घर उठा लाया था। अनेक स्थान शरीर के जले से जाते थे। स्थान-स्थान पर पट्टियां बंधी थीं।

उपद्रवी केवल उपद्रवी थे। लूट-पाट और हत्या ही उनका उद्देश्य था। वे शीघ्र ही भाग गये थे। कुछ उनके लोग और कुछ गाँव के लोग खेत रहे थे। कुछ पशु, सम्पत्ति लुटेरे ले गये थे और कुछ मनुष्य भी। कुछ भोपड़ियाँ और मकान भस्म हो गये थे।

'अपना घर जल चुका है। बहुत थोड़ी सामग्री बची है।' उसकी स्त्री उसके सिरहाने बैठी थी और भरे नेत्रो से उसी की ओर दोख रही थी।

'गंगा कहां है?' पत्नी की बात का उत्तर दिये बिना उसने पूछा। गंगा - उसकी विधवा युवती बहिन, गंगा के समान ही पवित्र बहिन गंगा उसे क्यों नहीं दीखती।

'वह तो मिली नहीं।' पत्नी ने सिर झुका लिया।

'मिली नहीं? कहाँ गयी वह?' वह झटके से उठ बैठा। एक क्षण में सब बातें उसकी समझ में आ गयी। पत्नी ने उसे रोकना चाहा; किंतु पता नहीं कहाँ की शक्ति उसमें आ गयी थी। स्त्री को एक ओर झटककर वह बाहर आया। बिना किसी की सहायता के उसने सांडिनी कसी और उड़ चला। आज उसकी ऊँटनी को भी जैसे पंख लग गये थे। अच्छे पशु अपने आरोही की आतुरता भाँप लेते हैं।

'महाराज!' उसे और कहां जाना था। उसके परम आधार तो उसके महाराज ही थे।

'तुम क्या चाहते हो?' ठिकानेदारजी ने बड़े ही धैर्य से, बड़ी शान्ति से उसकी बातें सुनी। लेकिन वे कर ही क्या सकते थे। उनके साथ ही ऐसा कुछ हुआ होता तो भी वे क्या कर सकते थे? एक ठिकानेदार की शक्ति ही कितनी होती है और यह तो अब दूसरे देश की बात हो गयी थी।

'मेरी बहिन!' वह तो पागल हो रहा था।

'मैं क्या करुं? जहाँ इस समय अपने पूरे देश की शक्ति कुछ नहीं कर पा रही है, वहाँ मैं कर क्या सकता हूँ।' ठिकानेदारजी उसे बहुत मानते थे, बहुत स्नेह करते थे उससे, लेकिन विवश थे।

'हे भगवान! वह धम से गिर पड़ा भूमि में। उसका जो आधार था, टूट गया। उसकी आशा नष्ट हो गयी।

'भगवान्!' आशा नष्ट होने पर मनुष्य कदाचित् ही जीवित रह पाता है। लेकिन मुख में भगवान का नाम आया और एक नवीन लहर आयी हृदय में। एक आशा की दूसरी ज्योति दिखाई दी।

वह पढा-लिखा कम ही है। उसे तो तलवार की और राजपूत के आत्मगौरव की शिक्षा मिली है। वह शिक्षा इस समय काम आवे, ऐसा नहीं है। उसका कुल भगवान नारायण का उपासक रहा है। वह बचपन से साधु-संतों में श्रद्धा रखता आया है। यहां से कुछ दुर एक टेकरी है। टेकरी पर एक कुटिया है। कुटिया में एक संत रहते हैं। संत सिद्ध हैं। सिद्ध संत अपनी इच्छा से ही सब कुछ कर सकते हैं। यही है उसकी आशा का आधार। उसकी ऊंटनी फिर पूरे वेग से दौड़ने लगी है।
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उसका दुःख, उसकी पीड़ा - मैं उसके शरीर में बंधी पट्टियों के नीचे के घावों की बात नहीं कहता। उन घावों में होती जलन की बात नहीं कहता और नहीं कहता उस रक्त की बात जो कपड़े की पट्टियों से ऊपर तक आ गया दीख रहा है। उसे स्वयं इस पीड़ा का, इन घावों का इस समय पता नहीं है। पीड़ा का हाहाकार तो हो रहा है उसके हृदय में। एक राजपूता और उसकी बहिन - गंगा सी पवित्र बहिन वे क्रूर पशु ...... पिशाच.....।

साधु की बात वह सुनता रहा। साधु की बात सुन लेनी चाहिये, यह उसने सुना है। साधु को अप्रसन्न नहीं करना चाहिये, यह वह जानता है। पता नहीं क्यों, इस टेकरी पर पैर रखते ही उसका उन्माद बहुत कुछ दूर हो गया है। उसका हृदय अपने-आप किसी अज्ञात कारण से आश्वस्त होता जा रहा है। साधु की बात सुन सके, इतना धैर्य उसमें आ गया है।

'परमात्मा!' उसने साधु की बात सुनकर बड़ी कातरता से कहा। वह आस्तिक न सही, साधू महाराज भगवान के परम भक्त हैं। वह उन्हीं से तो दया की याचना करने यहाँ आया है।

'भगवान् दयामय हैं। वे किसी आर्त प्राणी की पुकार कभी अनसुनी नहीं करते। कोई संकट में उन्हें पुकारे और वे उसकी पुकार न सुनें, यह हो नहीं सकता।' साधु पर उसकी पुकार का प्रभाव पड़ा था। उनके स्वर में वज्र जैसी दृढता और सम्पूर्ण निश्चय था। उनके नेत्र आकाश में कहीं स्थिर हो गये थे।

'परमात्मा!' वह एक बार फिर चीत्कार कर उठा। साधु के आदेश का उसके हृदय पर सीधे प्रभाव पड़ा था।

'भैया!' उसकी पुकार पूरी होते-न-होते दूसरी पुकार आयी। टेकरीपर चढता कोई नारी-स्वर गुंज गया।

'गंगा!' वह चौंक पड़ा और दूसरे क्षण ही दौड़ा।

'दयामय प्रभु!' साधु ने भूमि पर मस्तक रख दिया और फिर अपने दोनों नेत्र पोंछ लिए।

गंगा अकेली नहीं आयी थी। उसके साथ एक और लड़की थी। आज का गंगा का स्वरूप देखने ही योग्य था। उसके केश बिखर रहे थे। सारा शरीर रेत में भरा था। दाहिने हाथ में एक नंगी तलवार थी, जिसे अब भाई को देखते हो उसने झन से दूर फेंक दिया था। उसके मुख पर, उसके नेत्रों में अद्भुत दीप्ति थी। उसने बायें हाथ से उस लड़की का हाथ पकड़ रखा था और वह लड़की तो जैसे पुतली हो। गंगा के हाथ के संकेत पर चले चलने के अतिरिक्त जैसे वह और कुछ करना जानती ही न हो।

'तू यहाँ कैसे आयी बेटी! यह कौन है?' जब भाई-बहिन मिल चुके, उनका आवेग घटा, गंगा ने और दूसरी लड़की ने साधु के चरणों में सिर झुकाया और बैठ गयी, तब साधु ने पूछा।

'मेरे गांव पर रात में लुटेरों ने आक्रमण किया था।' गंगा ने मस्तक नीचे किये हुए कहा।

'तुम्हारे भाई ने बहुत कुछ बता दिया है।' साधु ने बीच में रोका - 'तुम लुटेरों के हाथ से छूट कैसे आयी?'

'मुझे किसने पकड़ा था? मुझे कौन पकड़ सकता था।' गंगा ने ऐसे दृढ स्वर में कहा, जिसे सुनकर उसके भाई को भी आश्चर्य हुआ। वह भी अपनी बहिन का मुख देखने लगा।

'तब तुम थी कहाँ?' साधू ने ही पूछा।

'बाबा! लुटेरे बहुत बुरे होते हैं। वे किसी स्त्री के धर्म की रक्षा करना नहीं चाहते। गंगा के लिए यह बहुत बुरी और बहुत अद्भुत बात थी। भला कोई मनुष्य किसी स्त्री की मर्यादा का कैसे सम्मान नहीं करेगा। वे लुटेरे इस बेचारी को पकड़े लिये जा रहे थे। इसे बहुत गंदी-गंदी गालियाँ दे रहे थे। यह रो रही थी, गिड़गिड़ा रही थी, प्रार्थना कर रही थी, पर वे सुनते ही नहीं थे।'

'तू. इसे बचाने गयी थी?' साधू इस स्नेह से पूछ रहे थे, जैसे अपनी सगी पुत्री से पूछ रहे हों।

'मैं बचाने नहीं जाती बाबा? यह मेरी गाँव की बहन लगती है। कोई दुख में हो तो बचाना नहीं चाहिये बाबा?' गंगा ने सहज भाव से कहा - 'मैं दौड़ी, मुझे एक कसा खाली घोड़ा मिल गया। एक कोई वहाँ मरा पड़ा था, मैंने उसकी तलवार ले ली। लेकिन बाबा! लुटेरे बड़े कायर होते हैं। मैं उनके पीछे घोड़ा दौड़ाती गयी। उन्होंने पहले तो गोलियाँ चलायी; लेकिन फिर पीछे डर गये। इसे घोड़े से उतारकर वे सब भाग गये। मैं इसे घोड़े पर बैठाकर घर आ रही थी, लेकिन रास्ता भूल गयी। पता नहीं कहां भटक गयी वह घोड़ा भी बड़ा अड़ियल था। बार-बार पीछे ही मुड़कर भागता था। इससे मैंने उसे छोड़ दिया। बहुत भटकती-भटकाती यहां आयी हूँ। बहुत थक गयी हूँ बाबा!'

'उतने लुटेरों के पीछे तू अकेली दौड़ी गयी। तुझे डर नहीं लगा? वे तुझे पकड़ लेते तो क्या करती?' साधु के स्वर में उलाहना नहीं, स्नेह था।

'क्या मैं मरना नहीं जानती? वे मुझे कैसे पकड़ लेते? भगवान् नहीं हैं क्या बाबा? भगवान् मुझे बचाते न। मैं उन सबसे क्यों डरूं?' गंगा की वाणी में अविचल विश्वास था।

'इसका नाम है - आस्तिकता! तुमने आस्तिक देखा?' साधु ने गंगा के बदले उसके भाई की ओर देखा।

वह क्या कहे? उसका जी चाहता है कि अपनी इस बहिन के पैरों पर सिर रख दे। वह गंगा का भाई है, यही क्या कम गौरव की बात है उसके लिये।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 11

।।श्री हरिः।।
3 - दाता की जय हो!

कुएँ पर रखा पत्थर पानी खींचने की रस्सी से बराबर रगड़ता रहता है और उस पर लकीरें पड़ जाती हैं; इसी प्रकार कोई एक ही शब्द बराबर रटा करे तो उसकी जीभ पर या मस्तिष्क पर कोई विशेष लकीर पड़ती है या नहीं, यह बताना तो शरीरशास्त्र के विद्वान का काम है। मैं तो इतना जानता हूँ कि जहाँ वह नित्य बैठा करता था, वहाँ का पत्थर कुछ चिकना हो गया है। श्रीबांकेबिहारीजी के मन्दिर के बाहर कोने वाली सँकरी सीढी के ऊपर वह बैठता था और एक ही रट थी उसकी - 'दाता की जय हो!'

मैं अनेक बार दर्शन खुलने से पर्याप्त पूर्व पहुँचा हूँ। वैसे भी श्रीबांकेबिहारीजी बड़े मनमौजी ठाकुर हैं। कभी उठेंगे तो साढ़े नौ बजे ही उठ जायेंगे और नहीं तो बारह बजे तक भी दर्शनार्थी गर्भगृह के फाटक की ओर टकटकी लगाये रहेंगे। अनेक बार मुझे एक घंटे से भी अधिक दर्शन की प्रतीक्षा में बैठना पड़ता है। इतने पर भी कभी ऐसा नहीं हुआ कि मैंने उसे उस सीढी के ऊपरी भाग पर अनुपस्थित पाया हो। वह कब वहां आकर बैठता था और कब वहां से उठता था, यह मुझे पता नहीं। इतना महत्वपूर्ण वह नहीं था कि कोई भी उसके आने या चले जाने पर ध्यान दे। मुझे आशा नहीं कि सीढी के पास या सामने की दिशा में जो तनिक हटकर दूकान है, उसके दूकानदार भी उस भिखारी के वहाँ बैठने तथा वहाँ से जाने का समय बता सकें।

जैसे दीमकों ने किसी मिट्टी के ढेले को चारों ओर से खा लिया हो या चूहों ने किसी फल को ऊपर-ऊपर से कुतर लिया हो, भगवती रासभवाहिनी ने उसके मुख को ऐसी आकृति दे दी थी। शीतलादेवी ने उसकी आकृति ही नहीं बिगाड़ी थी, उसके नेत्र भी हर लिये थे। उसके नेत्रों में से एक तो बाहर निकल-सा आया था और दूसरा धंसकर लाल रंग पतला गड्ढा मात्र रह गया था। उन नेत्रों की ओर देखना किसी के लिए भी अरुचिकर था और इसीलिए यदि मैं उसकी पूरी हुलिया ठीक-ठीक न बता पाऊँ तो मुझे पूरी आशा है कि आप मुझे क्षमा कर देंगें; क्योंकि आप समझ ही सकते हैं कि वह कोई दर्शनीय पुरुष नहीं था। मैंने तो जितना एक दृष्टि में देखा जा सकता है अनिच्छापूर्वक उसे देखा है और क्योंकि ऐसा बार-बार करना पड़ा हैं, इससे मुझे इतना और पता लग गया है कि उस पर लकवेने भी कभी कृपा की थी। उसका एक हाथ और एक पैर लगभग तभी से पैंशन पाने योग्य हो गये। वह घसिटता हुआ ही चल पाता था।

मन्दिर के मुख्यद्वार के सामने की सीढी पर्याप्त चौड़ी है; किंतु भिखारी बैठना चाहते हैं और बैठते हैं कोनेवाली सीढी के पास। वह सीढी बाजार की ओर से आने वालों को पहले मिलती है, अतः लोग उसी से ऊपर चढते हैं और उसी से उतरते भी हैं। सँकरी है वह सीढी और भीड़ भी उस पर अधिक रहती है। उसके ऊपरी भाग में दोनों ओर कठिनता से दो-दो मनुष्य दब-सिकुड़कर बैठ सकते हैं। दो वृद्धा बंगाली भिखारिनें बैठती हैं, एक कोई और भिक्षुक तथा एक वह अन्धा बैठा करता था।

मैले फटे चिथड़े थे उसके शरीर पर ओर जो बायाँ हाथ काम कर सकता था, उसमें अलुमोनियम की एक पिचकी मैली कटोरी रहती थी। अपनी कटोरी वह प्राय: आगे बढाये रहता था और जैसे जप करता हो, एक ही रट लगाये रहता था - 'दाता की जय हो!'

बाबू लोग और बाबा लोग दोनों ही उस गंदे भिखारी को छू जाने के भय से वहाँ पहुँच कर झिझक उठते थे और उनके एक ओर हटने के प्रयत्न में वहाँ दुसरे यात्रि यों को धक्का लगना एक सहज क्रिया हो गयी थी। चटक-मटक करती, चप्पलें चटकाती महिलाएँ उसे देखकर मुख फेर लेतीं। उनकी नाक से अकारण ही रुमाल जा टकराता था। कभी कोई श्रद्धालु बाबू या कोई वृद्धा उसकी कटोरी में एक पैसा या कोई फल अथवा किसी अन्न के कुछ दाने डाल भी देते थे और तब उसके कण्ठ में उत्साह आ जाता था। वह अधिक उच्चध्वनि से कहता था - 'दाता की जय हो!'

लोग उससे घृणा करते थे, उसे देखकर दूर हटते थे, नाक-भौ सिकोड़ते थे; किंतु उसे इससे क्या? सभी बातो में कुछ-न-कुछ अच्छाई होती है। उसके अंधे होने में भी यह अच्छाई थी कि वह लोगों के इस घृणा भाव एवं तिरस्कार को देख नहीं पाता था। नेत्रों की शक्ति ने स्वयं नष्ट होकर उसे इस अपमान से असम्पृक्त बना दिया था। वह तो एक समान सभी पदध्वनियों को समझता था। उसके लिये तो बालक और बूढे, स्त्री और पुरुष, उजले और मैले, सुन्दर और कुरुप, सब एक जैसे थे। वह तो सभी पदध्वनियों का स्वागत करता और कहता - 'दाता की जय हो!'
************************************

'वह कौन है?' आज जब वह अन्धा भिखारी अपने स्थान पर बैठा दिखायी नहीं पड़ा, तब नित्य की अभ्यस्त
आँखें वहीं रुक गयी। उसके बैठने का स्थान कुछ सूना-सूना लगा, कुछ ऐसा जो अनुभव होता है; किंतु कहा नहीं जा सकता। पैर स्वत: वहां रुक गये और तब जिज्ञासा हुई - 'वह आज यहाँ क्यों नहीं है?'

यात्री सीढी से धड़ाधड ऊपर जा रहे थे या नीचे उतर रहे थे, दूकानदार ग्राहकों को सामान दे रहे थे और और थोड़ी दूरी पर चबूतरे पर बंधी बछिया पागुर करती हुई आने-जाने वालों को अधखुले नेत्रों से यदाकदा देख लेती थी। किसी को स्मरण नहीं आया कि एक मनुष्य आज अनुपस्थित है। किसी का ध्यान अन्धे भिखारी के रिक्त स्थान की ओर नहीं गया। किसी को ध्यान देने का अवकाश नहीं था और वह स्थान यब रिक्त भी कहाँ था। वहाँ एक दूसरा भिखारी अभी-अभी आकर बैठ गया है। यह उससे तगड़ा है। इसके नेत्र और मुख उतने कुरुप नहीं। इसके दोंनो हाथ और दोनों पैर स्वस्थ हैं। यह 'दाता की जय' नहीं मनाता। यह कहता है - 'भैया, भैया, देते जाओ। अन्धे को कुछ देते जाओ। राधेश्याम!'

हाँ, तो उसका स्थान रिक्त नहीं रहा। उस भिखारी का स्थान भी रिक्त नहीं रहा। विश्व में किसी का स्थान रिक्त नहीं रहता। चाहे कोई कितना भी बड़ा हो उसके न रहने पर विश्व का कोई काम दो क्षण के लिये भी अटकता नहीं। वह तो भिखमंगा था। उसकी ओर कौन ध्यान देता; लेकिन जो प्रख्यात हैं, जिनके बहुत अधिक स्वजन-बान्धव हैं, उन्हीं की ओर कौन ध्यान देता है। कौन किसके लिये अपने को व्यस्त करता है? वैसे तो नन्हें बच्चे का खिलौना टूट जाता है तो वह भी रोता है। इसी प्रकार जिनके स्वार्थ को धक्का लगता है वे रो-पीट लेते हैं। वह अन्धा था, अपाहिज था। उससे किसी का स्वार्थ नहीं था। वह जीता हो तो और मर गया हो तो, अब उसकी खोज-खबर कौन ले? किसलिये?

'वह अंधा कहाँ गया?' कुतूहलवश पास बैठी बुढिया से पूछ लिया।

'पता नहीं क्या हुआ?' बुढिया को भी आश्चर्य था और खेद भी था। उसने कहा - 'बाबू! बहुत सीधा था वह। मुझसे कभी झगड़ता नहीं था। दैव ने उसे भिखारी बना दिया, नहीं तो, बड़े आदमी का लड़का था वह।'

'बड़े आदमी का लड़का?' कुतूहल और सहानुभूति जगी। सच तो यह है कि हमारे मन में मनुष्य के प्रति सहानुभूति नहीं रही है। हमारी मानवता मर गयी है। बड़प्पन के प्रति, धन के लिए हमारी जो लिप्सा है, वही कभी नम्रता, कभी भय, कभी आतंक, कभी सहानुभूति और कभी अन्य कोई रूप में व्यक्त होती है।

उस अन्धे ने अपने समीप बैठने वाली इस वृद्धा भिखारिणी से अपना पिछला जीवन-परिचय बताया था। स्वाभाविक था कि समाज से उपेक्षित दो भिखारियों में परस्पर सहानुभूति हो और वे एक-दुसरे से अपनी बीती बतावें। बुढिया कोई इतिहास-अन्वेषक नहीं थी और न अन्धे ने ही उसे एक ही दिन में क्रमबद्ध जीवनचरित सुनाया होगा। यह भी सम्भव है कि अन्धे ने कुछ बातें छोड़ दी हों और कुछ सर्वथा गढ़कर सुनायी हों। अपने को गौरवशाली सिद्ध करने का प्रलोभन जिन्हें झूठ बोलने के लिए फुसला न पाये, कम-से-कम वह अन्धा ऐसे महत्तम लोगों में था या नहीं, यह कौन जानता है। लेकिन मेरे पास अब सच-झूठ का विवेचन करने का कोई साधन नहीं है। अन्धे के गत जीवन की बातों में बहुत-सी झूठी हों तो भी आप निश्चिन्त रह सकते हैं। उससे आपकी, समाज की या इतिहास की कोई हानि नहीं होगी; क्योंकि वह बेचारा अन्धा और चाहे जो रहा हो, पर ऐतिहासिक पुरुष तो एकदम नहीं था।

बुढिया ने मुझे जो बताया, उसका तात्पर्य यह था कि वह कहीं पूरब का (जापान, सिंगापुर या रंगून का नहीं और कलकत्ते का भी नहीं। पूरब का अर्थ बलिया, छपरा या बिहार का) रहने वाला था। उसके पिता अच्छे जमींदार थे। गंगा-किनारे पक्का बड़ा-सा मकान था। घर पर हाथी, घोड़े, गाय, बैल सभी थे। अपने पिता का वह अकेला लड़का था। माता जन्म के कुछ दिन पीछे ही भगवान के घर चली। पिता ने उसे पाला-पोसा। उसका बड़ा दुलार - बड़ा सत्कार था। बड़े होने पर यह वह स्कूल जाने लगा और उसे घर पर भी पढाने के लिए मास्टर आने लगे। चौथी कक्षा में परीक्षा दे चुकने के पश्चात् उस पर शीतला देवी की कृपा हुई। इस रोग ने उसके नेत्र ले लिये। घर पर मुकद्दमे में पिता के लगने के कारण जमींदारी बिक गयी। बिहार के प्रसिद्ध भूकम्प में उसकी कोठी गिर पड़ी और पिताजी की उसी में समाधि हो गयी। इस शोक के समय ही उसे लकवे का धक्का लगा। भुकम्प में जो स्वयंसेवक सेवा कार्य करने आये थे, उन लोगों की सेवा तथा चिकित्सा से प्राण बच गये। कई महीने में वह घिसटकर चलने योग्य हुआ। जन्मभूमि में रहना अब उसके लिये कठिन हो गया। अपना कोई सगा-सम्बन्धी था नहीं। कोई रहा भी हो तो ऐसी दशा में क्या संसार के सम्बन्धी कभी सहायक होते हैं? किसी प्रकार माँगते-खाते वह चल पड़ा। रेल में बाबुओं के तिरस्कार और गाली की उपेक्षा किये बिना काम कैसे चलता? अन्तत: वह श्रीवृन्दावन-धाम पहुँच गया।

बुढिया ने उसके घर का ऐश्वर्य बहुत बढा-चढाकर सुनाया। उसने कभी उसकी माता या पिता की प्रशंसा की और कभी उसके अज्ञात सगे-संबन्धियों कों तथा रेल के टिकट बाबुओं को कोसा। उसकी सब बातें यहाँ लिखना किसी काम का नहीं है। उसे आज एक साफ-सुथरे वस्त्र वाला श्रोता मिला था। वह उमंग में आ गयी थी और इस उमंग ने ही अन्धे भिखारी के प्रति उसकी सहानुभूति और बढा दी। उसकी कथा को विराम देने के लिये मैंने पुछा - 'वह गया कहाँ?'

'बाबु! मुझे क्या पता कि वह कहां गया?' वह कुछ खिन्न होकर बोली - 'आज पहली बार वह यहां नहीं आया है।'

'रहता कहाँ है वह?' मैं जानता था कि कहीं सड़क के किनारे या किसी खंडहर में उसका डेरा होगा।

'कालीदह के पास जो टूटी बुर्जी है...!' बुढिया ने एक पता बताया आसपास के सब चिह्नों का वर्णन करके। उसे आश्चर्य हो कि एक बाबू क्यों इस प्रकार एक भिखारी के सम्बन्ध में उत्सुक हो रहा है। मैंने उसके सामने एक दुअन्नी फेंक दी और उस भिखारी का पता लगाने मुड़ पड़ा। पता नहीं क्यों मेरे मन में उसके लिये पूरा कुतूहल जाग पड़ा था।
*****************************************

'बाबूजी!' बुढिया भिखारिन ने मुझे पुकारा। मैं कठिनाई से दस पद गया होऊँगा।

'क्या?' लौटकर मैंने उससे पूछा।

'कल वह अन्धा शाम को मन्दिर में चला गया था।' बुढिया को कभी कदाचित् ही किसी एक व्यक्ति ने दो आने पैसे दिये होंगे। उसे आज दुअन्नी मिली थी, अत: उसे जो कुछ पता था, यह सब बता देना चाहती थी।

'अच्छा ही हुआ। उसने भगवान को प्रणाम कर लिया।' मुझे बुढिया ने ही बताया था कि यह अन्धा जाति से ऊँचा था। कदाचित् ब्राह्मण था वह। इसलिए मन्दिर में उसके चले जाने की बात मुझे खटक नहीं सकती थी।

'प्रणाम कहां किया उसने। वह तो वहां भी 'दाता की जय!' कहकर कटोरी आगे करके भगवान से भीख मांग रहा था। मन्दिर के दाढी वाले अधिकारी ने उसे डांट दिया और लोगों ने ठेल-ठाल कर निकाल दिया मन्दिर से बाहर।' बुढिया का स्वर कह रहा था कि ऐसा होना ही स्वाभाविक हुआ। भला कहीं कोई ठाकुरजी से भीख
माँगता है।

'सभी तो माँगने ही जाते हैं। एक अन्धा भिखारी भी माँगने गया उस सवेंश्वर के समीप तो कौन-भूल की उसने? लेकिन दूसरे मुस्टण्डे भिखारियों से यह देखा नहीं गया। उन्होंने उस दीन को दीनबन्धु के यहां से भी धक्का देकर निकाल दिया!' मैंने ये बातें अपने मन में कहीं; क्योंकि वह वृद्धा इनको समझेगी, ऐसी आशा नहीं की जा सकती।

'वह जो पत्थर है न, उस पर संन्यासी बाबा कल शाम को दर्शन खुलने से कुछ पहले आ बैठे थे। उनके साथ
कई बाबू लोग थे। वे महात्माजी जोर-जोर से बातें कर रहे थे।' मन्दिर से बाहर चबूतरे पर कई पत्थर के चौड़े तख्ते से बने हैं। उन पटियों पर दर्शनार्थी थोड़ा-बहुत विश्राम कर लेते हैं, आगे-पीछे छूटे साथियों की प्रतीक्षा कर लेते हैं या दर्शन खुलने में कुछ देर हो तो दो-दो चार-चार बैठ कर कुछ चर्चा भी करते हैं। बुढिया ने इनमें से उस अन्तिम पत्थर की ओर सकेंत किया जो इस सीढी से सबसे समीप है।

'वे महात्माजी कह रहे थे कि भगवान् बड़े दयालु हैं। श्रीबाँकेबिहारीजी से बड़ा दानी सारे संसार में और कोई नहीं। लोग झूठे ही दूसरों के आगे हाथ फैलाते हैं। बाँकेबिहारी के आगे हाथ फैलाकर फिर और किसी के आगे नहीं फैलाना पड़ता।' बुढिया कहती गयी - 'बाबू! साधु, संत तो ऐसी ज्ञान की बातें कहते ही हैं। कोई ऐसी बात सुनकर कहीं भगवान से भीख माँगने थोड़े ही जाता है? लेकिन वह तो घसिटता हुआ मन्दिर में चला ही गया। मैं उसे मना करती उसके पीछे-पीछे गयी। उसने जाते ही कटोरी बढा दी और चिल्लाकर बोला - 'दाता की जय!' मैं बचाकर निकाल न लाती तो लोग पीट-पीटकर उसको भरता बना देते। बाहर आकर वह बैठा नहीं, सीधे घसीटता हुआ चला गया यहां से। बाबू! कहीं भिखारी का रूठना और शान दिखाना चल सकता है?'

बुढिया की धारणा थी कि वह अन्धा शान में आकर चला गया है और इसीलिए आज नहीं आया है। यह बात वह पहले कहना नहीं चाहती थी। मेरे लिये अब यहाँ ठहरना कठिन हो गया था। मैं तो उस मानधनी को देखने के लिए उत्सुक हो उठा था।
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आप सोचते हैं - मुझे वह अन्धा भिखारी मिल गया? हाँ, मिल तो गया; किन्तु न अन्धा मिला और न भिखारी ही मिला। यदि बुढिया के बताये खंडहर में अपने चिथड़ों में लिपटा वह तब तक पड़ा न होता तो मैं उसे पहचान सकता - ऐसा सम्भव नहीं था। वही चिथड़े, वही कटोरी, वही दीमकों से खाये ढेले-जैसा मुख; किंतु वह अंधा नहीं था। उसकी दोनों आँखें भली चंगी थी। उसके दोनों हाथ और दोनों पैर स्वस्थ थे, यह मैं पीछे देख सका लेकिन यह मैंने पहुंचते ही देख लिया कि जैसे वह अन्धा नहीं है, वैसे ही वह भिखारी भी नहीं है। उसके मुख पर न दीनता है न याचना है। उस पर तो ऐसी मस्ती है, ऐसा तेज है, ऐसी सम्पन्नता है; जैसे सारा विश्व भिक्षुक है और एकमात्र दाता वह स्वयं है।

'बाबा!' कोई भी होता मेरे स्थान पर तो उसे इसी प्रकार पुकारता। आज उसकी उपेक्षा या तिरस्कार करना शक्य नहीं था। मैंने पन्द्रह-बीस मिनट चुपचाप बिताये देखने में और तब पुकारा उसे।

'बाबा!' मेरा शब्द खण्डहर में प्रतिध्वनित हुआ और वह चौंका। उसने मेरी ओर देखा और खुलकर हँस पड़ा। बड़ी देर तक हँसता रहा वह। 'तू आ गया? इतनी जल्दी आ गया तू? जा, मैं नाराज नहीं हूँ। क्या हुआ जो उन लोगों ने मुझे घक्के देकर निकाल दिया। तू इतनी दूर क्यों आया? भूखा होगा तू। थक गये होंगे तेरे चरण। जा, वहाँ भोग लग रहा होगा। अरे हाँ, जब तू ही मेरा है तो लेना-देना क्या? बार-बार क्षमा माँगने क्यों आता है? चल, मैं ही चलता हूँ तेरे साथ।' सम्भवत: वह पागल हो गया था। उसके नेत्र मेरी ओर थे, बस, इतना ही सच है; नहीं तो, वह न तो मुझे देख रहा था और न मुझसे बात कर रहा था। वह किससे बातें कर रहा था? पागल किससे बात करते है, यह क्या कभी कोई जान सका है?

वह पागल था? ना, वह पागल नहीं था। लेकिन अब यह बात कहने से लाभ क्या? जब यह बात समझ में आयी, वह जा चुका था। वह बात करते-करते सहसा उठ खड़ा हुआ। मेरी अपेक्षा किये बिना मेरे बगल से खंडहर से निकला। पास के कुएं में उसने अपनी कटोरी में से कुछ उठाकर फेंक दिया। क्या फेंक दिया? पीली-पीली चमकीली कोई वस्तु। सम्भवत: एक अशर्फी? अशर्फी! हाँ; क्योंकि उसकी कटोरी में मैंने एक झलक पहले पा ली थी। कहाँ मिली उसे यह? सहसा स्मरण हुआ कि कल सायंकाल वह श्रीबाँकेबिहारी के सामने कटोरी करके कह आया था - 'दाता की जय!' तब उन दीनबन्धु ने उसे क्या छूछा लौटा दिया होगा?

वह किससे बातें कर रहा था? अब क्या यह भी बताने की बात है। क्या कोई और भी ऐसा है जो अपने याचक को स्वयं अपने-आपको दे डाले और इतने पर भी संकुचित ही होता रहे? लेकिन अब वह बात करने वाला यहाँ नहीं है और जिससे वह बातें कर रहा था, उसे तो उसके जैसे भाग्यशाली के नेत्र ही देख पाते हैं। मैं उस कुएँ के पास खड़ा रह गया कुछ क्षण ठक् से और इतने में वह दौड़ता-भागता किधर चला गया कुछ पता नहीं। बहुत ढूंढा, बहुत देखा इधर-उधर किंतु इस प्रकार कभी ऐसे लोग मिला करते हैं।
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देश में कितने मन्दिर है, कैसे गिना जाय और यह भी कैसे बताया जाय कि उनके सामने सीढियों पर या सड़कों पर कितने भिखारी बैठते हैं तथा 'दाता की जय' मनाया करते हैं। वे चाहे जो शब्द बोलें, तात्पर्य एक ही है। उन भिखारियों की ही चर्चा क्यों, कोठियों में रहनेवाले, मोटरों में घूमने वाले बाबूजी, सेठजी, लालाजी, कलक्टरसाहेब, मिनिस्टरसाहेब आदि कहलाने वाले भी तो भिखारी ही हैं। कोई हाथ फैलाकर पेट दिखाकर माँगता है, कोई मुख बनाकर, भौहें मटकाकर माँगता है। सब माँगते हैं, सब चाहते हैं, सबके मुख न सही प्राण तो कहते ही हैं - 'दाता की जय हो!'

'मन्दिरों मे आराध्यपीठ पर वही महादानी विराजमान है। ये भिखारी क्यों सीढियोंपर ही दिन-रात बैठे रहते हैं? ये क्यों भिखारियों के सामने हाथ फैलाते-फैलाते थक जाते हैं? क्यों ये मन्दिरमें नहीं जाते? क्यों ये उस सच्चे दाता के आगे ही हाथ फैलाकर नहीं कहते - 'दाता की जय हो!'

कौन समझावे इन्हें? जो समझाने योग्य था, जो अनुभवी था, वह तो पता नहीं कहाँ चला गया। मैं नित्य श्रीबाँकेबिहारीजी जाता हुँ; पर वह तो फिर आया ही नहीं। वह जहाँ बैठकर भीख माँगता था, वह स्थान तो भर गया; किंतु जहाँ उसने सच्चे दाता से मांगा था, वह रिक्त है। कोई भरेगा उसे?

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 10

।।श्री हरिः।।
17 - सात्विक त्याग

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेर्जुन।
संगत्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सात्विको मत:।।
(गीता 18।9)

'कुमार! आखेट एक व्यसन है - दुर्निवार व्यसन!' जब कमर पर त्रोंण कसकर, हाथ में धनुष लेकर परिकरों के साथ राजकुमार ने अरण्य की ओर प्रस्थान से पूर्व अपने अस्त्रगुरु के चरणों में मस्तक झुकाया, वे रजतकेश महाधनुर्धर बोले - 'व्यसन सदा त्याज्य है; क्योंकि वह पतन का हेतु होता है। साथ ही कर्तव्य से परांमुख होना कापुरुषता है।'

'श्रीचरणों के आदेश मुझे प्रकाश प्रदान करेंगे।' युवक राजकुमार ने अनुमति प्राप्त की और दो क्षण बीतते-न-बीतते उनका अश्व अपने सब अनुगतों को पीछे छोड़ चुका था। आखेट-सहायकदल प्रयत्न कर रहा था कि वह साथ ही रहे और आखेट-निर्देशक ने तो अन्त में राजकुमार को पुकार ही लिया। प्रथम आखेट के समय अनुभवहीन युवक को एकाकी वन में कैसे जाने दिया जा सकता है?

'इधर दो वर्ष से श्रीमान नहीं पधारे हैं!' अभी कल एक वन्यजनपद के प्रतिनिधि ने आकर नरेश से प्रार्थना की। 'हमारे खेतों के लुटेरे वनपशु, सम्भव है, हमें भूखों मरने के लिए विवश कर दें। इधर हमारे गृह-पशुओं को पशुशाला की परिखा कूदकर वे उठा ले जाते हैं और पिछले तीन महीने-से एक शेर मानव-भक्षी हो गया है। उसने अकेले पड़ने वाले घसियारों को तो मारा ही था, कल ग्राम के पास से वह एक किशोर को उठा ले गया।

नरेश ने समाचार सुना और उनके नेत्र भर आये। वे वृद्ध हो गये हैं। रोग ने उन्हें जर्जर कर दिया है। पूरे वर्षभर से अश्व की पीठ का स्पर्श नहीं कर सके वे। सेनापति जायेंगे, किंतु पुत्र के समान प्रजा की रक्षा का भार सेनापति पर छोड़ कर क्या निश्चिन्त रहा जा सकता है? आज यदि उनका शरीर थोड़ा भी साथ दे पाता......।

'राजकुमार कल आपके जनपद की ओर प्रस्थान करेंगे?' राज्य के अस्त्र-शिक्षक ने जो घोषणा की, उसने महाराज को, राजसभा को ही नहीं, स्वयं राजकुमार को भी चकित कर दिया। 'जब तक वन्यपशुओं का उपद्रव शान्त न हो जाय, उनका आखेट-शिविर आपके जनपद के समीप रहेगा; किंतु वे पूरा ध्यान रखेंगे कि उनके शिविर के कारण आप लोगों को कोई असुविधा न हो।'

'वे हमारे स्वामी' - वन्य प्रतिनिधि उठ खड़ा हुआ। 'उनसे हमें असुविधा क्या होगी; हमारे भाग्य ऐसे नहीं कि हम उनका स्वागत कर सकें। इतनी ही उनकी क्या कम कृपा है कि वे हमारे जनपद की ओर पधारेंगे।'

'राजकुमार आखेट करने जायेंगे?' आशंका नरेश को थी, ऐसा ही नहीं - प्रत्येक का चित्त सशंक था।

'हिंसा का यह घोर कर्म मुझे करना पड़ेगा?' राजसभा से उठते ही राजकुमार अपने अस्त्रशिक्षक के सम्मुख उपस्थित हुए। बहुत सम्मान करते हैं राजकुमार इन वृद्ध महाधनुर्धर का। किंतु ऐसा आदेश पाने की आशा उन्हें नहीं थी।

'तुम न जाओ तो मुझे जाना होगा और मैं समझ लूंगा कि जीवन में प्रथम बार एक अनधिकारी को शिक्षा देने की भूल मैंने की।' अस्त्रशिक्षक ने राजकुमार के मुख पर नेत्र स्थिर कर दिये। 'जो आपत्तिग्रस्त जनों को अभय देने आगे न बढ़ सके, धिक्कार है उसके क्षत्रिय होने को। अस्त्र-शिक्षा का और उपयोग भी क्या होगा। कर्म अपने आप में कहां शुभ या अशुभ है। यों तो तुम श्वास लेते हो, तब भी सहस्त्रों जीव मरते हैं।'

'मैं अवज्ञा करने की धृष्टता नहीं कर सकता।' राजकुमार ने मस्तक झुका दिया। 'आखेट के औचित्य की बात - हिंसा मुझे ही नहीं, श्रीचरणों को भी अत्यन्त अप्रिय है।'

'वत्स! तुम जानते हो हो कि इस वृद्ध ने अहिंसा का व्रत ले लिया है, किंतु तुम प्रस्तुत न हो तो मेरा धनुष अब भी वन में मृत्यु-वर्षा करने में समर्थ है।' स्नेहपूर्ण स्वर - 'यह हिंसा हो भी तो उसका फल हम भोग लेंगे। जो अपने जीवन तथा आजीविका की रक्षा के लिए तुम्हारी ओर देखते हैं, उन्हें अभय देने के लिए ही तुम्हारे हाथ में धनुष है। तुम्हारा कर्तव्य तुम्हें वन में पुकार रहा है।'

'मैं प्रातः प्रस्थान करूंगा।' राजकुमार ने सादर आदेश स्वीकार कर लिया। उनके आखेट के लिये शेष बातों की व्यवस्था स्वयं महाधनुर्धर ने अपने हाथ में ली। प्रात: सूर्योंदय के कुछ काल पीछे ही वन्य प्रतिनिधि के साथ राजकुमार का पूरा दल प्रस्थान कर चुका था।
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'ठहरो!' वज्रकठोर स्वर। आखेट-प्रमुख के कर धनुष की प्रत्यञ्चा पर जैसे स्तम्भित हो गये। बलाबलपूर्वक खींचने से अश्व लगभग दो पैरों पर खड़ा हो गया। पीछे मुड़कर देखने को आवश्यकता नहीं हुई। पूरे वेग में राजकुमार का अश्व आया और ठीक सम्मुख खड़े हो गया - 'एक शिशुवती माता की हत्या आप नहीं कर सकते।'

'आखेट के कुछ नियम होते हैं कुमार!' आखेट-प्रमुख ने अपने अश्व को सँभाला और धनुष से बाण उतार लिया। आप ठीक मेरे घनुष के सम्मुख आ खड़े हुए हैं और मनुष्य सदा सावधान नहीं रहता। सिंहनी बिफर नहीं
उठेगी - क्या आश्वासन!'

'मानवता के नियम आखेट के नियमों से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।' राजकुमार के स्वर में अब भी आवेश था। वे देख रहे थे कि आखेटप्रमुख के नेत्र दूर लक्ष्य पर थे और उनके दक्षिण कर का बाण अभी त्रोंण में नहीं गया था। 'मेरे प्राणों की अपेक्षा उस माता के जीवन का अधिक मूल्य है; जिसके ऊपर उसके तीन शिशु निर्भर करते हैं।'

'हमने एक नर सिंह मार दिया है। वह मानवभक्षी था।' आखेट-प्रमुख ने अपने अनुभव का परिचय दिया। 'यदि वह इसी परिवार का हो, ये शिशु भी मानव-मांस का स्वाद पा चुके होंगे और कुछ महीनो में ही भयप्रद हो जायेंगे।'

'अपने अपूर्ण अनुमान के आधार पर हम हत्या करने तो आये नहीं है।' राजकुमार ने अब आगे देखा। सिंहनी इतनी देर में अपने शावकों को लेकर गुफा में जा चुकी थी। 'हम यहाँ निरीक्षक रख दे सकते हैं। यदि यह परिवार मानव-भक्षी भी हो गया हो तब भी शिशुओं को और उनकी माता को मारा नहीं जा सकता। हम उन्हें अपनी जन्तुशाला में ले जायेंगे।'

'कुमार! क्षमा करें।' आखेट-प्रमुख का स्वर गद्गद हो उठा? 'जीवन में आज एक सच्चे आखेटक के दर्शन हुए मुझे। आखेट-शास्त्रों में पढा मैंने भी यह सब है; किंतु वन में इन सब बातों का पालन भी किया जाता है, आज यह जीवित शिक्षा प्राप्त हुई। मैं आखेट का प्रमुख निर्देशक भले होऊँ, उसके आदर्श की प्रेरणा मुझे आपसे लेनी चाहिये, यह समझ गया।

'शुर हत्यारे नहीं हुआ करते!' राजकुमार ने किंचित् संकोच का अनुभव किया। 'मुझे तो आपसे शिक्षा लेनी है।पिता ने भी आपके संरक्षण में मुझे भेजा है। मैं चाहता यही हूँ कि एक भी निरपराध पशु न मारा जाय। जहां तक सम्भव हो, वन्य पशुओं को भयभीत करके हम जनपद से दूर घने वनों में चले जाने को विवश कर दें। ऐसी व्यवस्था यहाँ कर जायं कि वे शीघ्र इधर लौट न आवें।'

'अब तक मैंने यहीं सीखा था कि आखेट का सम्मान अधिक-से-अधिक पशूचर्म प्राप्त करने में है। दोनों ही आखेटक अपने अश्वों को मोड़ चुके थे। आखेट-प्रमुख अपनी बात कह रहे थे - 'आज दुसरी बात कुमार ने हमें दी।'

'सम्पूर्ण जीवन ही एक आखेट-क्रीड़ा है। यह मेरे शस्त्रगुरु ने एक बार कहा था।' कुमार गम्भीर हो गये। 'हम हत्या का व्यसन पाल लेंगे आखेट में, तो जीवन में भी उत्पीड़न एवं परस्व-हरण के पाप से बच नहीं सकेंगे। कर्तव्य है, इसलिए कर्म करना है। उसमें आसक्ति - आखेट में आसक्ति व्यसन है, यह चेतावनी शस्त्रगुरु ने चलते समय दी है मुझे।'
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'कुमार! कल तुमने मुझे मारा है।' विशाल-वपु केशरी खड़ा था सम्मुख; किन्तु आज उसके नेत्रों से अंगार नहीं झड़ते थे और उसका भयानक मुख भी खुला नहीं था। उसकी दिगन्तकम्पी गर्जना तो कल ही सदा को सो चुकी। 'मैं तुम्हें उपालम्भ नहीं देता। मैं आक्रमणकारी था, तुम मुझे मार न देते तो मैं तुम्हें अवश्य मार देता।'

आखेट से श्रान्त राजकुमार अपने शिविर में तृणशय्या पर सो रहे थे । प्रगाढ़ निद्रा आयी थी उन्हें; किन्तु इस समय अब ये स्वप्न देख रहे थे। सदा की भाँति आज रात्रि के चतुर्थ प्रहर में वे जाग्रत् नहीं हो सके। पता नहीं, कल की श्रान्ति का परिणाम था यह, अथवा जो स्वप्न वे देख रहे थे, उसे विश्वविधायक को अवकाश देना था।

'दोष मेरा भी नहीं है। मेरे आवास के समीप कोलाहल सुनकर मेरे शिशुओं की जननी चिन्तित हो उठी थी।' केहरी कहता गया। 'मेरा शौर्य सहधर्मिणी को चिन्तित नहीं देख सकता था। धाता ने स्वभाव से ही मेरी जाति को असहिष्णु बनाया है।'

शिविर के बाहर प्रहरी शान्त पदों से टहल रहा था। आखेट-प्रमुख ने उसे आदेश दिया था कि राजकुमार यदि
विलम्ब से भी उठे, तब भी उनको स्वत: उठने दिया जाय। आज उनकी निद्रा में व्याघात नहीं पड़ना चाहिये। कल कानन में वे अत्यधिक श्रान्त हो चुके हैं।

'तुम्हारे बाणों ने मुझे सद्गति दी। मैं तुम्हारा कृतज्ञ हूँ। अत्यधिक कृतज्ञ इसलिए हूँ कि कल ही तुमने मेरी संतानों की रक्षा की। मेरी सिंहनी को तुमने आखेटक का लक्ष्य होने से बचाया।' राजकुमार स्वप्न में भी आश्चर्य कर रहे थे कि इतना क्रूर प्राणी भी कितना कृतज्ञ हुआ करता है। सिंह आगे बोला - 'मैं इस वेश में केवल इसलिए आया हूँ कि तुम मुझे पहिचान सको। नियम-निष्ठ आखेटक के शस्त्रों से मृत-पशु पवित्र होकर स्वर्ग में स्थान प्राप्त करता है।'

'तुमने मुझे सद्गति दी और मेरे शिशुओं कों बचाया। मैं इस समय समर्थ हूँ। मेरा प्रसाद व्यर्थ नहीं जाना चाहिये।' स्वप्न में राजकुमार ने देखा कि सिंह सहसा एक ज्योतिर्मय दिव्य-देहधारी मनुष्याकृति में परिवर्तित हो गया है। वह रत्नाभरणभूषित निश्चय कोई देवता है। अब वह देवता कह रहा था - 'प्रात: निद्रात्याग के पश्चात सोच लेना कि तुम्हें जीवन में क्या चाहिये। अपनी नियमित अर्चा के उपरान्त आधे मुहूर्त तक तुम जो भी कामनाएं करोगे, वे सब पूर्ण होंगी।'

'मैंने कोई सत्कार्य तो किया नहीं।' निद्रा से उठते ही राजकुमार के मन में पहिली बात आयी। केहरी निरपराध था। उसके आवास के समीप हम लोग गये न होते, वह आक्रमण करने हमारे शिविर पर तो आ नहीं रहा था। मेरा अपराध उसके मन में नहीं आता - देवता का यह सहज औदार्य; किन्तु मैंने आगे जो किया, वह मेरा कर्तव्य-मात्र था।'

राजकुमार देर से उठे थे आज। नित्यकर्मों से निवृत्त होने में उन्हें देर होनी ही थी। आखेट-प्रमुख को कोई शीघ्रता नहीं थी। आज तो यहां से राजधानी प्रस्थान करना था। यहां का कार्य तो समाप्त हो चुका। प्रस्थान कुछ देर से भी हो तो वनमार्ग की छाया आतप का कष्ट नहीं होने देगी।

'पशु और मानव सब अपनी मर्यादा में रहें। सबका मंगल हो!' आप इसे कामना कह सकते हो तो अर्चा समाप्त करके यह कामना राजकुमार ने अवश्य की थी। इसके पश्चात् वे पुन: ध्यान करने में लग गये थे। पूरा मुहूर्त भर अधिक लगाया उन्होंने उस दिन ध्यान में।

'हम सब किसी सेवा के योग्य नहीं।' प्रस्थान को प्रस्तुत राजकुमार के सम्मुख वन्य जनपद के कुछ लोग उपस्थित हुए थे। वे अद्भुत औषधियाँ, दुर्लभ वीरुध तथा अन्य उपहार ले आये थे - 'यह घासफूस स्वीकृति पा जाय, हम अपने को धन्य मानें।'

'आपके स्नेह ने हमें धन्य किया।' राजकुमार ने उपहार लौटाये नहीं; किन्तु लानेवालों को पुरस्कार स्वीकार करना पड़ा और वह अल्प नहीं था। ‘हम तो यहाँ कर्तव्य का एक अंश पूर्ण कर सके, यही सबसे बड़ा उपहार।'

सुनते हैं, नगर लौटने पर शस्त्रगुरु ने अपने शिष्य को सच्चा त्यागी कहकर हृदय से लगाया था।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 10

।।श्री हरिः।।
15 - तामस त्याग

नियतस्य तु संन्यास: कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तितः।।
(गीता 18।7)

लंबा, दुबला, तनिक साँवला शरीर, गोल मुख, कुछ भीतर गड्ढे में धँसे मटमैले छोटे नेत्र। वे खादी पहिनते हैं; किंतु वह दूध-सी उजली कभी नहीं रहती। अपने हाथ साबुन लगाने से जितनी सफेद हो जाय और साबुन भी चौथे-पाँचवे ही तो मिल पाता है। अवस्था कितनी है, मुझे पता नहीं; किंतु सिर, दाढी और मूंछों के अधिकांश केश श्वेत हो चुके हैं। विद्वान् हैं - हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी तीन भाषाएँ जानते हैं। मैंने कभी नहीं पूछा कि कोई चौथी भाषा भी जानते हैं या नहीं। केवल खादी ही नहीं पहिनते, स्वाधीनता-संग्राम में भाग लेकर कारागार की चहारदीवारी के भीतर भी रह आये हैं।

उन पर रोष आना कठिन है। उन्हें देखकर दया आती है; किंतु उनसे दूर दूर रहना ही अच्छा है। पता नहीं किस बात पर वे रुष्ट हो जायें। जहाँ जायंगे - 'यहाँ यह होना चाहिए। तुम लोग यह क्यों नहीं करते? यह असावधानी, यह बेईमानी......' पता नहीं दर्जनों दोष उन्हें एकदम एक साथ दीख कैसे जाते हैं। दोष कहाँ नहीं होते, किसमें नहीं होते? हमारी असावधानी, अपूर्णता और परिस्थिति-जन्य विवशता - किंतु वे कुछ सुनना नहीं चाहते।

'मैं यह सब क्षमा नहीं कर सकता। समाचारपत्रों में लिखूंगा। अधिकारियों को सूचित करूंगा। किसी ने न सुना तो मेरे व्याख्यान जनता को बौखला देंगे। तुम लोगों को मैं निकलवाकर छोडूंगा।' भय और चिंता की कोई बात नहीं, वे इनमें से कुछ करनेवाले नहीं। वे यह कुछ कर नहीं सकते, यह मैं नहीं कह रहा हुँ। करने की योग्यता और शक्ति उनमें है; किंतु तत्परता नहीं है। आप निश्चिन्त रह सकते हैं। किंतु बोलना उनका स्वभाव है, उसे रोका नहीं जा सकता।

जहां रहेंगे - रहने की बात तो दूर, जहाँ घंटे-दो-घंटे को पहुँच जायेंगे, सबको क्षुब्ध कर देंगे। कोई व्यक्ति हल्ला मचाकर किसी को त्रुटियों का वर्णन आस पास प्रारम्भ कर दे, एक बार वातावरण को प्रतिकूल तो बना ही देता है। आप अपनी ऐसी आलोचना पसंद करेंगे?

'यहाँ यह होना चाहिये। यहाँ ऐसा प्रबन्ध होना चाहिये! यह बात एकदम नहीं होनी चाहिये। यह काम यहां न होकर वहाँ होना चाहिये। यह आदमी इस कार्य से अविलम्ब हटा दिया जाना चाहिये।' आप पूछेंगे, इसकी अपेक्षा उन्हें नहीं। अपने सुझाव देंगे ही और इतने उच्च स्वर में देंगे कि आपके साथ दस आदमी और सून लेंगे। उनके सुझावों को चरितार्थ करने की क्षमता तो कदाचित् ही किसी में निकले।

बड़े त्यागी हैं वे। कोई संग्रह नहीं उनके पास। शरीर पर पूरे वस्त्र तक नहीं। एकाध पुस्तक कदाचित कभी रख लेते हैं, कितने दिन रहेगी। पैसा है नहीं। मिल जाय तो रह नहीं पाता। अमुक वस्तु प्राप्त ही हो जाय, ऐसा भी कोई आग्रह नहीं दीखा उनमें। किसी पर लगातार कई दिन रुष्ट रहते हों सो भी नहीं। उनका क्रोध क्षणों का भले न होता हो, बद्धमूल भी नहीं होता।

निद्रा उन्हें आती नहीं। क्यों नहीं आती, कह पाना मेरे लिए कठिन है। यद्यपि मैं साधारण चिकित्सक हूँ - मैंने चेष्टा की और एकाध दिन निद्रा उन्हें आ भी गयी; किंतु वे तो इस तमोगुण को स्वीकार ही नहीं करना चाहते। निद्रा को समय का दुरुपयोग मानते हैं।

कोई साधुवेश उन्होंने स्वीकार नहीं किया है। गृहस्थ उन्हें आप कह नहीं सकते; क्योंकि गृह का त्याग कर दिया है उन्होंने। पत्नी की मृत्यु के पश्चात् घर उन्हें रहने के उपयुक्त नहीं जान पड़ा। अब दस-पांच दिन या
महीने-दो-महीने एक स्थान में, फिर दूसरे स्थानों मे - घूमते ही अवस्था व्यतीत हो रही है। अच्छा ही है यह उनके लिए। वे कहीं जमकर रहने लगे, उस स्थान के दूसरे लोगो को निश्चय बाध्य कर देंगे कि वे घर-द्वार छोड़कर भाग खड़े हों।

सुना है, पढा भी है कि त्याग से शान्ति प्राप्त होती है। राग अशान्ति का हेतु है, यह निर्विवाद तथ्य है। जब हेतु नहीं रहा, अशान्ति क्यों रहनी चाहिये? किंतु सच मानिये, इतना अशान्त मनुष्य मैंने नहीं देखा। स्वयं रात-दिन अशान्त और जहाँ रहे, दूसरे आस-पास के लोगों की शान्ति को फटकार कर दूर भगा देने वाला।

निरन्तर व्यग्र, निरन्तर दुखी व्यक्ति आपने नहीं देखा होगा। उनके मुखपर भी कभी-कभी प्रसन्नता दीखती है; किंतु बहुत कम। उनके क्रोध से भी भयंकर है उनका रुदन। वे किस बात पर क्रोध करेंगे और किस पर फूट-फूट कर रोते हुए अपने भाग्य को, अपनी असमर्थता को कोसने लगेंगे, कहना कठिन है। मुझे उन पर दया आती है; किंतु मैं उनसे दूर-दूर रहना ही पसंद करता हूँ।
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'आपने घर छोड़ा तो कोई आप पर आश्रित नहीं था?' एक दिन मैंने उनसे पूछा। प्राय: आ बैठते हैं और इनकी-उनकी इतनी त्रुटियाँ, इतने अपराध-विवरण उनके समीप सदा रहते हैं कि आप रात्रि-जागरण पसन्द कर लें तो भी उनकी सामग्री समाप्त नहीं होगी। मैं अल्पप्राण मनुष्य हूँ। बहुत थोड़ा धैर्य, बहुत कम सुनते रहने की शक्ति मुझमें है। उन्हें रोकने-टोकने का अर्थ है उनके रोष या रुदन को आमन्त्रण देना। इसलिए मैं अपनी ओर से कोई चर्चा चलाने का प्रयत्न करता हूँ और यदि इसमें असफल हो गया, नेत्र बन्द करके बिना निद्रा के सो जाने का अभिनय एकमात्र मेरा सहारा है।

'छोटे दो बच्चे थे।' उन्होंने इतनी तटस्थता से उत्तर दिया, मानो वे बच्चे उनके नहीं, किसी मनुष्य के भी नहीं, बकरी या मुर्गी के उपेक्षणीय शिशु थे।

'उनका पालन-शिक्षण .........।'

'आप इन व्यर्थ की बातों की चिन्ता क्यों करते हैं।' मुझे बीच में ही उन्होंने रोक दिया - 'सब अपना-अपना
लेकर आते हैं। अपने भाग्य का भोग उन्हें भोगना चाहिये। उनके लिए गृह में बँधे रहने को तो मनुष्य का जन्म नहीं मिला है।'

'मनुष्य का जन्म किसलिए मिला है।' यह प्रश्न करने का साहस मुझमें नहीं था। जानता था कि इसके उत्तर में वे जो प्रवचन प्रारम्भ करेंगे, वह कई घण्टे अविराम चलता रहेगा। वे ऐसे वक्ता नहीं जो बोलते-बोलते थक जाते हैं। सामान्य वक्तृत्व की बात तो दूर, किसी को कोसने में भी उन्हें बीच में पानी नहीं पीना पड़ता।

'मनुष्य-जन्म किस प्रकार सफल कर रहे हैं।' मुझे पागल कुत्ते ने नहीं काटा था कि मैं उनसे इस प्रकार पूछपर उनके क्रोध का पात्र बनता। क्रोध यदि उस समय उनको न आता - कोई सौभाग्य की बात नहीं होती। तब वे फूट-फूट कर क्रन्दन करने लगते और उनका रुदन मुझे उनके क्रोध से अधिक कष्टदायी लगता है।

'आप नियमित संध्या करते हैं?' जब भी वे मेरे पास आ बैठते हैं, उनकी अविराम वाग्धारा को अटकाने के लिए मुझे अपने मस्तिष्क पर दबाव डालना पड़ता है किंतु यह बात आपसे कह दी, उनसे मत कहिये। वे निजी प्रश्नों से कतराते हैं। जिन प्रश्नों के उत्तर में उनके पिछले जीवन का विवरण हो, उनके कर्तव्याकर्तव्य की पूछताछ हो, उन प्रश्नों का उत्तर वे दो शब्दों में देना चाहते हैं। जब देखते हैं कि आज उनसे ऐसे ही प्रश्न पूछे जायँगे, उन्हें कोई अत्यावश्यक कार्य स्मरण आ जाता है। आप समझ गये होंगे कि मैं उनसे प्रायः कैसी बातें पूछता होऊँगा।

'मैं इन कर्मकाण्डों को महत्त्व नहीं देता।' उनके स्वर में ऊबने का भाव स्पष्ट था। वे ब्राह्मण हैं, पर बड़ी सी चुटिया रखते नहीं; शिखाशुन्य भी आप उन्हें नहीं कह सकते। सिर के केश छोटे रखते हैं, अतः शिखा के स्थान पर जो दस-पाँच कुछ बड़े बाल हैं, वे उन्हें हिन्दू बताते हैं। वैसे जनेऊ खादी के सूत का खूब मोटा पहनते हैं वे।

'मैंने एक आदमी को अभी मिलने का वचन दिया है।' वे उठ खड़े हुए। मुझे तो इसकी आशा ही थी। मैं उनसे निजी प्रश्न न करूं, उनको कभी अपना किसी को दिया वचन स्मरण नहीं आ सकता।
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'तुम दूसरों के दोष देखने में जितना समय देते हो, उतना यदि भजन करने में लगाओ।' उस दिन मैं एक वीतराग महात्मा के पास गया था। देखा, वे वहाँ बैठे लोगों में सबसे आगे बैठे हैं। महात्मा उनको समझा रहे हैं - 'तुम्हें भी शान्ति मिले और दूसरों को भी तुमसे उद्वेग न हो।'

'मैं दूसरों के दोष देखता हूँ और आप सबके गुण-ही-गुण देखते हैं। मुझमें कोई गुण नहीं दीखता आपको।' वे बिगड़ उठे। 'लोग मनमानी करते रहें, पर किसी को बोलना नहीं चाहिये। जनता के पैसे और सार्वजनिक स्थानों का दुरुपयोग लोग कर रहे हैं, मैं उसे चलने नहीं दे सकता। जनता-जनार्दन की सेवा भगवान का भजन नहीं है, यह कहने वाला शास्त्रों का तात्पर्य तनिक भी नहीं समझता।'

वे खड़े हो गए आवेश के मारे और बोलते रहे। वहाँ बैठे लोगों में से एक समझदार सज्जन उठे। बड़ी नम्रतापूर्वक वे उन्हें साथ लेकर चले गये एक ओर। सबका समय नष्ट न हो, सबके सत्संग में बाधा न पड़े, इसलिए उन्होंने अपने सत्संग का समय उनको पृथक ले जाने में लगाया।

'त्याग से शान्ति मिलनी चाहिए।' मुझे जब अवसर मिला, मैंने महात्माजी से पूछा। ‘इनमें न संग्रह की प्रवृति है, न वस्तुओं का मोह दीखता है। किन्तु इतना अशान्त पुरुष........।'

'नारायण, त्याग सात्विक हो तो उससे निश्चय शान्ति प्राप्त होती है।' महात्मा ने मुझे बताया। 'परन्तु राजस त्याग शान्ति नहीं देता। वह तो निष्फल ही जाता है। त्याग राजस न होकर यदि तामस हो जाय तो अशान्ति का उद्भव बन जाता है।'

'त्याग से अशान्ति उत्पन्न होती है?' मैंने आश्चर्य के साथ पूछा। आपको भी यह बात सरलता से गले उतरती नहीं जान पड़ेगी।

'नारायण, यदि तुम स्नान का त्याग कर दो अथवा अपने वस्त्रों को स्वच्छ करने का प्रयत्न त्याग दो', महात्मा ने स्नेहभरे स्वर में समझाया - 'क्या होगा, जानते हो?'

'वस्त्र मैले हो जायेंगे, देह मैल से ढक जायगा।' मुझे स्वीकार करना पड़ा। 'दुर्गन्धि आयेगी और रोग आ सकता है।'

'इस त्याग ने तुमको और तुम्हारे समीपस्थों को क्या दिया - शान्ति या अशान्ति?' महात्मा का प्रश्न सीधा था। उत्तर बिना दिये ही दे दिया गया मुझे।

'नियत कर्तव्य का त्याग किसी अवस्था में उचित नहीं है। अज्ञान या कुतर्कवश कोई इसका त्याग कर ही दे' साधु कह रहे थे - 'इस तामस त्याग से उसके मन का मल बढता जायगा। कर्तव्य का पालन तो चित्त की नित्य स्वच्छता का हेतु है। वह स्वच्छता अवरुद्ध हुई, मल एकत्र होने लगा। जहाँ मल होगा, वहाँ दुर्गन्धि और रोग होगे। स्वयं तथा दूसरों को भी अशान्त तथा कष्ट के अतिरिक्त और क्या मिलेंगे, ऐसी स्थिति में।'

वे त्यागी हैं - बेचारे..........किंतु उन्हें समझाने का साहस मुझमें नहीं है। आप में से यदि कोई साहस कर सकते हों.......।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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