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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 10

।।श्री हरिः।।
2 - मा कर्मफलहेतुर्भूः

'आप रक्षा कर सकते हैं - आप बचा सकते हैं मेरे बच्चे को। वह वृद्धा क्रन्दन कर रही थी।' आप योगी हैं। आप महात्मा हैं। मेरे और कोई सहारा नहीं है।'

उस वृद्धा का एकमात्र पुत्र रोगशय्या पर पड़ा था। आज तीन महीने हो गये, कुछ पता नहीं चलता कि उसे हुआ क्या है। उसे भूख लगती नहीं, मस्तक में भयंकर पीड़ा होती है। पड़े-पड़े कराहता तो क्या, आर्तनाद किया करता है।

वृद्धा के और कोई नहीं। उसके बुढापे का सहारा उसका यह युवा पुत्र - इसी वर्ष उसका द्विरागमन होना था - अब क्या होगा? वैद्य-हकीम सभी तो कर लिये घर में जो कुछ था - गहने ही नहीं, बर्तन तक बिक गये। जिसने जो बताया, वही किया, किंतु रोग है कि बीस से उन्नीस होने का नाम नहीं लेता।

झाड़-फुंक, टोने-टोटके, यन्त्र-मन्त्र - कुछ बाकी नहीं। दुखी पुरुष इधर-उधर हाथ मारता है। बेचारी वृद्धा बहुत ही दुखी - अत्यन्त आर्त है। पता नहीं, किसके-किसके उसने पैर पकडे हैं। आज सुना कि बंदा बैरागी आये हैं तो दौड़ पड़ी। उसने सुना है कि बंदा योगी हैं। गुरू ने अपना तेज दे दिया है बंदा को। वे महापुरुष हैं। अकाल पुरुष की ज्योति उनमें उतरी है। वे अत्यन्त दयालु हैं। तब क्या उसपर दया नहीं करेंगे।

बंदा के पास पहुंच कर वह सीधे उनके पैरों पर गिर पड़ी। दोनों हाथों में उनके पैर पकड़ कर लिपट गयी। जब तक महापुरुष कृपा नहीं करेंगे, वह उनके पैर नहीं छोड़ेगी।

'माँ!' बंदा चौंक पड़े। उन्होंने बड़ी कठिनाई से वृद्धा को अपने पैरों पर से उठाया। वृद्धा ने रोते हुए कहा - 'मेरा बेटा मरणासन है; आप आशीर्वाद दें, वह अच्छा हो जाय। आपके आशीर्वाद से वह अवश्य रोगमुक्त हो जायेगा।'

'मैं क्या आशीर्वाद दूंगा। मेरे पास तो न कोई सिद्धि है, न तपस्या की शक्ति और न पुण्य।' बन्दा ने समझाने का प्रयत्न किया। 'कुछ कार्य मेरे द्वारा होता भी है तो वह परम पुरुष की कृपा और गुरु की प्रेरणा से। मैं कौन होता हूँ। जिसकी शक्ति कार्य करती है, कार्य के फल उसके।'

'आप एक चिटकी भस्म दे दें।' बुढिया इस समय उपदेश सुनने-समझने की स्थिति में नहीं थी। वह गिड़गिड़ा रही थी।

'जैसी जगदम्बा की आज्ञा!' बन्दा अत्यन्त गम्भीर हो उठे। उन्होंने उस बुढिया को मस्तक झुकाया - 'आप जगदम्बा ही तो हैं। बच्चे से जो कराना हो, करा लें।' और बन्दा के अनुचरों ने देखा कि उनका वह प्रसिद्ध सेनानी, आततायियों का चमत्कारी मूर्त आतंक आज सचमुच एक बैरागी बन गया है। एक साधु की गम्भीरता से बंदा ने वृद्धा के पैरों के पास से ही एक चिटकी धूलि उठायी, उसे मस्तक तक ले गये, एक बार दृष्टि आकाश की ओर गयी और वह धूलि उन्होंने वृद्धा के हाथ पर रख दी।

'मेरा बेटा अब जी जायगा!' बुढिया उल्लासपूर्वक उठ खड़ी हुई। उसने नहीं देखा कि बन्दा के नेत्र भर आये हैं। 'तुम्हारी तपस्या पूरी हो। तुम अकाल पुरुष के प्यारे बनो!' आशीर्वादों की वर्षा करती वह लौट पड़ी अपने घर की ओर ।
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'सुबेदार की सेना आ रही है। लगता है उसे आपके यहाँ होने का पता लग गया। बहुत बड़ी सेना है।' एक घुड़सवार सिख घोड़ा दौड़ाता आया था। कुछ दूर ही घोड़े से वह कूद पड़ा और बन्दा के सामने आकर मस्तक झुकाकर खड़ा हो गया। उसका घोड़ा पसीने से लथपथ हो रहा था। मुंह से झाग गिरा रहा था। स्पष्ट था कि वह पर्याप्त दूरी से अत्यधिक वेगपूर्वक दौड़ाया गया है और उसे बीच में तनिक भी दम नहीं लेने दिया गया है।

'हमारे साथ इस समय केवल पचीस सैनिक हैं।' बंदा के समीप खड़े, सुदृढकाय विशालदेह पुरुष ने बेदा की ओर देखा - 'आप आज्ञा करें तो हम लोग अब भी पर्वत तक पहुँच सकते हैं।'

'छि:!' बन्दा के नेत्रों में चमक आयी। 'अपने प्राणों के मोह से बैरागी इन ग्रामीणों को भेडियों की कृपा पर छोड़ कर भाग जायगा? तुम्हें भय लगता है?'

'धीरसिंह कभी डरा नहीं है!' उस भीमकाय पुरुष के नेत्र भी कठोर हुए और उसने अपनी मुँछो पर हाथ फेरा - 'आप सुरक्षित निकल जायें तो हमारा नेता ही नहीं, हमारे भाग्य सुरक्षित हो गया। मेरे साथ चार सैनिक छोड़ दीजिये, मैं इन आने वाले कुत्तों से सुलझ लूंगा।'

'अकाल पुरुष के हाथों में हम सबका भाग्य सुरक्षित है।' बन्दा ने कवच धारण करते-करते कहा। 'बैरागी अपने मित्रों को शत्रु के बीच छोड़ जायगा, ऐसी आशा तुम उससे नहीं कर सकते!'

'सूबेदार की सेना आ रही है हमें लूटने और बैरागी ने तलवार उठा ली है।' अच्छा बड़ा ग्राम था - साधारण कस्बा। बात फैलते देर नहीं लगी। पंजाबी युवक का रक्त कभी शीतल नहीं रहा है और इस समय तो बहती गंगा में हाथ धोना था - 'बंदा बैरागी का साथ देने का हमें सौभाग्य मिला है। बैरागी-महाकाली खप्पर लिये युद्ध में जिनके आगे चलती है।'
पूरे पंजाब में बन्दा बैरागी अतिमानव - लोकोत्तर चमत्कारी महापुरुष माने जाते थे। वे पराजित भी किये जा सकते हैं, यह बात कोई सोचतक नहीं सकता था। शत्रु-सेना पाँच सौ है, पाँच हजार है या पचास हजार है - कोई सोचना नहीं चाहता। विजय तो बैरागी के चरणों में रहती है। उनके नेतृत्व में शस्त्र उठाकर यश का लाभ ही तो लेना है।

'धीरसिंह!' अपने घोड़े पर बैठते-बैठते बन्दा ने सहचर को सम्बोधित किया - 'हमारे पास केवल पचीस सैनिक नहीं हैं।'

'मैं आपके नाम का प्रताप समझता हूँ।' धीरसिंह ने देखा कि हल पकड़ने वाले हाथ अब भाला या तलवार उठाये हैं। ग्रामीण तरुणों की संख्या बढती जा रही है। वृद्ध तक दौड़े आ रहे हैं।

'प्रताप तो सर्वत्र परमात्माका!' बन्दा ने किसी अलक्ष्य के प्रति मस्तक झुकाया। 'मिट्टी के किसी पुतले का प्रताप क्या हो सकता है। तुम इन नवीन सैनिकों को सँभाल लोगे?'

'जैसी आपकी आज्ञा!' धीरसिंह ने ग्रामीण तरुणों को परिस्थिति समझायी ओर व्यूहबद्ध करना प्रारम्भ किया। इतना अनुशासन - कोई दीर्घकालीन सुशिक्षित सेना भी चकित रह जाय; क्योंकि वीरसिंह कह रहे थे - 'आप सबके सेनापति इस समय बन्दा बैरागी हैं - महायोगी बैरागी। आपको उनकी आज्ञा के एक-एक अक्षर का पालन करना है।'

'हम पालन करेंगे!' बैरागी की आज्ञा तो परमात्मा की आज्ञा है। उसे अस्वीकार कोई कैसे कर सकता है।

पता नहीं था कि शत्रु किधर से आक्रमण करेगा, वह ग्राम पर घेरा डालेगा या सीधे घुस पड़ना चाहेगा; किंतु बैरागी ने शत्रु की संख्या या उसके व्यूह की अपेक्षा कब की है। उनका अश्व जैसे वायु में उड़ रहा था। उनके आदेश यन्त्र की भाँति उनके सैनिक ग्रामीण पालन कर रहे थे। घड़ीभर में तो गाँव से एक कोस दूर तक चारों ओर मोर्चा जम गया। वृक्षों के शिखर, ऊँचे टीले, गहरे खड्ड - सब कहीं बैरागी के सैनिक सावधान बैठ चुके थे और मैंदान में बन्दा के साथ चुने हुए दस घुड़सवार धूलि उड़ाते दौड़ लगा रहे थे।
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सचमूच विजय बन्दा बैरागी के चरणों के पीछे चला करती है। शत्रु का सैन्यदल ठीक कितना था, पता नही - पांच हजार से अधिक ही होगा। बैरागी के पास सैनिक कुल पचीस थे; और ग्रामीणों को भी गिन लें तो पाँच सौ से अधिक नहीं। किंतु युद्ध कठिनाई से तीन घंटे चला होगा।

सेना सूबेदार की ही थी; किंतु वह न बैरागी को पकड़ने, आयी थी न उनसे युद्ध करने को प्रस्तुत थी। वे लोग तो आये थे - गाँव के निरीह लोगों को लूटने - काफिरों को कत्ल करके गाजी बनने, साथ ही जेबें गरम करने और हो सके तो कोई सुंदर-सी लड़की ले जाने। उनके सैनिकों के भाव इसी प्रकार के थे। सिर का सौदा करने को उनमें कोई तैयार नहीं था। बैरागी से सामना हो जायगा, यह उन्हें पता होता तो इधर कदम रखने की भूल वे कर नहीं सकते थे।

'अल्लाहो अकबर!' की पुकार करती आततायियों की समुद्र-सी उमड़ती वह सेना; किंतु उसने सुना - 'सत श्रीअकाल!' 'वाह गुरु की फतह!' 'बन्दा बैरागी की जय है!' और उनके मुखों से 'अल्लाहो अकबर!' बन्द हो गया। वे 'या खुदा! या अल्लाह' चिल्लाने लगे।

'बन्दा बैरागी - शैतान का फरिश्ता यह काफिर! हवाइयां उड़ने लगी शत्रु-सैनिकों के मुखपर - 'शैतान इसके तीरों को सौ गुना कर दिया करता है। मल्कुल मौत इसके साथ दौड़ती है।'

सचमुच मौत दौड़ रही थी बन्दा के अश्व के साथ। उनका अश्व जिधर से निकल जाता था, उनके बाणों की बौछार उधर भूमि को लाशों से ढक देती थी।

'बैरागी आ गया! कयामत उतर आयी उसके साथ! बहुत शीघ्र शत्रु के पैर उखड़ गये। अपने घायलों तक को कराहते छोड़ कर वे भागे और भागते चले गये। उन्हें बन्दा नहीं, बन्दा का भय खदेड़े चला जा रहा था; क्योंकि भागते शत्रु को तो न बैरागी कभी खदेड़ते न उन पर चोट करते।
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'आपकी कृपा से हमने विजय प्राप्त की!' बन्दा युद्ध से लौटे थे और अपने सदा के नियम के अनुसार वे किसी पर्वत पर अकेले ध्यान करने जाना चाहते थे। धीरसिंह ने आग्रह किया - 'शत्रु से छीनी सामग्री के वितरण का तो आप आदेश दे जायें।'

'आप साक्षात भगवान् हैं! आपने मेरे पुत्र को जीवित कर दिया!' सहसा वृद्धा आ गिरी बैरागी के चरणों पर। उसके साथ आया था उसका पुत्र। अब भी वह बहुत दुर्बल था, किंतु उसके मुखपर आरोग्य की चमक आ चुकी थी।

'माता, परमात्मा को धन्यवाद दो! तुम्हारे पुत्र को उस दयामय ने अच्छा किया है!' बन्दा बैरागी ने धीरसिंह की ओर मुख किया - 'और भाई तुम भी। विजय उस प्रभु की हुई और उसी की शक्ति से हुई।'

'फल हुआ - वह प्रभु की कृपा, उनका प्रसाद।' बैरागी अश्व पर बैठते बोले - 'उसे अपने कर्म का फल मानकर पूरे कर्म का उत्तरदायित्व क्यों सिर पर लेते हो। अपने को कर्मफल का कारण कभी मत बनाओ, फल को भगवान पर छोड़ दो। कोई कर्म तुम्हें बाँध नहीं सकेगा।

बैरागी का अश्व उड़ चला। विजय में प्राप्त श्रेय तथा सम्पत्ति न कभी वे लेते थे, न उसकी व्यवस्था का आदेश करते थे। वे वीतराग .........

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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bhagwan quotes  मानव नेत्र के सामने प्रकृति का कत्ल होना खुद में ग्लानी है,लेकिन इससे भी बड़ी ग्लानि है मजबूरी तले बच्चों की नेत्र से ख्वाब का भटक जाना।

#Nojoto #Hindi #Heart #Pain #Love #baby #Top

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 9

|| श्री हरि: ||
11 - जिज्ञासु

'प्रकृति भी भूल करती है।' अपने आप डाक्टर हडसन कह रहे थे। उन्होंने साबुन से हाथ धोये और आपरेशन-ड्रेस बदलने लगे। 'जड़ नहीं जड़ तो कभी भूल नहीं करता। उसमें भूल करने की योग्यता ही कहां होती है। मशीन तो निश्चित ही कार्य करेगी।'

आज जिस शव का डाक्टर ने आपरेशन किया था, उसने एक नयी समस्या खड़ी कर दी। बात यह थी कि जिस किसी का भी वह शव हो इतना तो निश्चित ही था कि उसने अपनी लगभग साठ वर्ष की आयु पूर्ण की है और उसका शरीर सिद्ध करता है कि वह एक स्वस्थ-सबल पुरुष रहा है। डाक्टर को आश्चर्य में डाल दिया था उस शव की शरीर-रचना ने। ऊपर से देखने पर सामान्य पुरुष के शरीर में और उसमें कोई भेद नहीं था; किन्तु भीतर हृदय दाहिनी और यकृत बांयी ओर। सम्पूर्ण अन्त्र एवं स्नायुजाल साधारण शरीर-रचना से विपरीत दिशा मेँ।

'जैसे रचनाकार ने सभी आँतो को उलटी दिशा में रखकर परीक्षण किया हो कि इस दशा में उसकी कृति ठीक काम करती है या नहीं।' डाक्टर के मस्तिष्क में आपरेशन के समय से ही यह प्रश्न चक्कर काट रहा था।

उन्होने शव को मेज पर ही सुरक्षित छोड़ दिया था और उसके पूरे भीतरी शरीर का फोटो लेने के लिए कैमरामैन को बुलवा भेजा था। उनके सहकारी ने विस्तृत विवरण नोट कर लिया था। यह भी निश्चय हो गया था कि यह शव प्रधान विज्ञानशाला को दे दिया जायगा।

'भूल एवं परीक्षण तो चेतन ही करता है।' डाक्टर का ध्यान शरीर-रचना की अद्भुतता के बदले कारण की ओर अधिक था। 'तब क्या सृष्टि का सचमुच कोई चेतन रचनाकार है?' उन्हें स्वयं अपने विचारों पर आश्चर्य हो रहा था। ऐसे भद्दे अँधविश्वासों की बात सोचने में भी उनका परिष्कृत मस्तिष्क झिझकता था।

बचपन में माता-पिता की आस्तिकता ने उन्हें पूर्णतः प्रभावित किया था। प्रत्येक रविवार की अपनी माता की अँगुली पकड़कर वे गिरजाघर जाया करते थे। नेत्र बंदकर किसी अज्ञय सत्ता का अनुभव करने का बहुत अधिक गम्भीर प्रयत्न होता था, मानो वहाँ पादरी कहा करते थे 'यह बच्चा निश्चय संत होगा।'

यह भी स्मरण है कि हाई स्कूल तथा कालेज में सहपाठी उनका परिहास करते थे। आस्तिकता, धर्म एवं ईश्वर का पक्ष लेकर विवाद करनेवालों में वे समर्थक पक्ष के सबसे उत्साही छात्र थे। प्रायः उनका परिहास करने के लिए ही सहपाठी ऐसे विवाद प्रारम्भ करते थे और भावुकतावश वे शीघ्र आवेश में आ जाते थे।

संगती का प्रभाव पड़ता ही है। निरन्तर के व्यंग्य एवं आक्षेप ने सन्देह का बीज अंकुरित कर दिया। इतने पर भी बाल्य संस्कार प्रबल रहे। परीक्षण का निश्चय हुआ और माता-पिता की इंजीनियर बनाने की इच्छा के विरुद्ध मि. हडसन आज डाक्टर हडसन हैं। उन्होंने शव-परिक्षण में अत्यधिक श्रम किया। मरते समय पशु एवं मनुष्यों की भरपूर जाँच की। जीवित खरगोशों को चीरकर जीव को पकड़ने का प्रयत्न किया। अन्तत: वे इस निश्चय पर पहुँचे। 'शरीरों में जीव-जैसी कोई सत्ता नहीं। इश्वर सचमुच मानव का मानसपुत्र ही है और धर्म मानव-दुर्बलताओं का संघीभाव। ईश्वर एवं धर्म का मूल भय एवं मोहजन्य अविश्वास ही है।'
'यदि सृष्टिकार कोई चेतन हो' डाक्टर की निर्णीत धारणाओं पर आज के शव ने पानी फेर दिया था। वे आमुल नये सिरे से विचार करने को बाध्य हो गये थे। 'तब तो जीव भी होगा। ईश्वर भी होगा और तब धर्म अनिवार्य हो रहेगा।' आज मन में पुन: दुविधा उत्पन्न हो गयी थी। इस अन्तर- द्वंद्व से त्राण पाने का कोई मार्ग। दिखायी ही नहीं देता था।

'इस विषय में भारतीयों ने सबसे अधिक अन्वेषण किया है। इतने दिनों के अनुभव से आज डाक्टर जान चुके हैं कि डाक्टरी चीर-फाड़ से जीव के सम्बन्ध में कुछ भी जानना सम्भव नहीं है। सच्चा जिज्ञासु भूल भले ही जाय, सदा के लिए पथभ्रष्ट नहीं हो सकता। डाक्टर की जिज्ञासा सच्ची थी। उन्हें भारत-प्रवास का निश्चय करने में दो क्षण की भ देरी नहीं लगी।
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(2)
'मैं भी बुद्ध हो रहूँगा। गौतम भी तो मनुष्य ही थे। तपस्या यदि उनके लिए सम्भव थी तो मेरे लिए अशक्य नहीं होगी।' डाक्टर ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली। विलायत में वे अमिताभ के सम्बन्ध में बहुत अध्ययन कर चुके हैं। यहाँ आते ही कौट-पतलुन छोड़कर मुण्डित मस्तक होने एवं पीले वरुत्रों को पहनने में उन्हें कोई संकोच नहीं हुआ। कांटा-चम्मच तो छूट ही गया था, अन्न छोड़ कर वे पूरे फलाहारी हो गये।

'तपस्या के लिए तो हिमालय का प्रदेश ही भारत में श्रेष्ठ माना गया है।' सम्पूर्ण भारतीय ढ़ंग अपनाने का निश्चय हो गया था। बिना पूरी विधि के भारतीय तत्वज्ञान भला कैसे मिलेगा। 'एक बार जान लूं, फिर उपलब्धि के आधुनिक युगानुरुप वैज्ञानिक साधन आविष्कृत करना सरल हो जायगा।' अन्वेषण की लगन और उसके लिए पराकाष्ठा का त्याग यूरोपीय सभ्यता की अपनी वस्तु है।
नैनीताल से कुछ नीचे, सुन्दर स्वच्छ सलिल की कल-कलवाहिनी छोटी पर्वतीय सरिता के किनारे, गरम जल के झरने से कुल दो सौ गज दूर, पुष्पित हरित लता-तरुओं के मध्य एक कुटिया बन गयी। यों बरगद का वृक्ष समीप था और उसी को बोधिवृक्ष बनाने का सपना था डाक्टर के मन में।

आसपास के लोगों में कुतूहल स्वाभाविक था। भीड़ यों ही गोरे चमड़े का साधु देखकर आने लगी थी। जब ज्ञात हुआ कि वह तो वटमूल की वेदिका पर सात दिन से बिना खाये-पीये बैठा है, बैठे-बैठे ही सो लेता है, मेला एकत्र होना स्वाभाविक था। डाक्टर इसकी पहले से सम्भावना कर चुका था। उसकी सावधानी का स्वरूप था दढियल सिक्ख पहरेदार। वाह भीड़ को वँहा पहुँचने से पहले ही रोककर लौटा देता था। लोगों के पुष्प, चन्दन, फल उसकी तपस्या में विघ्न डालने न पहुँच सके।

'इस प्रकार तो मृत्यु ही हो जायगी।' उसने पहले नहीं सोचा था बुद्धकी मानसिक एवं शारीरिक शक्ती के सम्बन्ध मेँ। 'मैं यूरोपियन हूँ। गौतम के समान वातावरण में रहने का पूर्वाभ्यास मुझे है नहीं।' शरीर दुर्बल एवं अशक्त हो गया था। धैर्य को कष्टों ने विचलित कर दिया था। क्षुधा-पिपासा किसे व्याकुल नहीं कर देती और वह तो सात दिनसे उस स्थान से उठा भी नहीं था।

'मन? - मन तो ऐसे अटपट चाट एवं भोजनों का बराबर चिंतन करता है, जिनकी मैंने कभी पहले कल्पना भी नहीं की थी। जिन बाजारू वस्तुओं से मैंने सदा घृणा की है, वही आज मुझे प्रलुब्ध कर रही हैं।'

मन प्रतिक्रिया कर रहा था बलप्रयोग से विद्रोही होकर। अशांत हो उठा था वह तपस्वी। उसके लिए इस कष्ट सहिष्णुता का कोई अर्थ रह नहीं गया।

'भूल तो मेरी ही है।' उसे स्मरण हुआ कि पूरे चालिस दिन के उपवास के अनन्तर गौतम ने भी तपस्या का परित्याग तो उसे व्यर्थ समझकर ही किया था। 'मैं भी कैसा मूर्ख हूँ।' उसने धीरे से पहरेदार को पुकारा और उसे संतरे का रस ले आने की आज्ञा दे दी।
लोकापवाद से तो वे डरते हैं जिनका उद्देश्य लोकैषणा होता है। 'लोग क्या कहेंगे?' सच्चे हृदयों में यह प्रश्न कभी उठता ही नहीं। अवश्य ही शारीरिक दुर्बलता उसे वहाँ से दस-पन्द्रह दिन कहीं जाने न देगी।
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(3)
'तो तुम्हें पुस्तकों में कुछ भी नहीं मिला?' वे जटाजूट धारी महात्मा हँस पड़े। प्रणाम के अनन्त्र प्रश्न का अवकाश भी नहीं दिया था उन्होंने। 'साधुओं में भी तुम्हें कोई मार्गदर्शक उपलब्ध न हुआ?'

'मेरा दुर्भाग्य।' रो पड़ा वह। पूरे दो वर्ष तो वह अपनी पहाड़ी कुटिया में' ग्रन्थों के पीछे पड़ा रहा। बौद्ध, जैन, शांकरवेदान्त, रामानुज तथा दूसरे वैष्णवों के ग्रन्थ, तन्त्रग्रन्थ सब छान डाले उसने। सबके सिद्धान्त, प्रक्रिया का बड़ा विद्वान अवश्य हो गया वह, किन्तु क्या मिला उसे? ग्रन्थों में अनेक प्रकार के योग, अनुष्ठान, उपासनाएँ उसे मिली। सबका मूल था, 'किसी गुरू के शरणागत होकर तब कुछ करो।' अन्ततः दो वर्ष बाद वह योग्य गुरू के अन्वेषण में निकला। ग्रन्थों के अध्ययन ने उसे महापुरुष के सम्बन्ध में एक निश्चित धारणा दे दी थी। उसे ठगा नहीं जा सकता।

तीन वर्ष से कुछ अधिक ही भटकता रहा है। पूरे भारत के दो चक्कर कर चुका है। दुर्गम वनों में, पहाड़ों में, सुदूर गाँवों में, पता नहीं कहाँ कहाँ भटका है। प्राय: सभी कहीं उसका स्वागत हुआ है। बहुत-से स्थानों पर उसे सिद्धियों-द्वारा आकर्षित करनेका प्रयत्न हुआ है। विद्वत्तापूर्ण व्याख्याएँ उसके लिए व्यर्थ थी। सिद्धियां उसे आकर्षित न कर सकी। रहस्य उसे भ्रान्त करने में असमर्थ रहा। वह जिज्ञासु था। सच्ची भूख थी उसमें अध्यात्म की। वह भूख जो आडम्बर को अपनर धमक से भस्म कर देती है।

'यह कैसे कहूँ कि महापुरुषों में कोई मुझे कृतार्थ करने में समर्थ न थे।' जिज्ञासु नम्र होता है। उसमें संपूर्ण नम्रता विद्यमान थी। आज वह जिस दुर्बल गौरवर्ण तेजस्वी महापुरुष के समीप पहुंच गया था, उन्होनें पता नहीं क्यों उसके हृदय को, अत्यधिक आकर्षित कर लिया था। यह दूसरी बात है कि वे बहुत तो क्या थोड़े भी प्रसिध्द नहीं थे। उन्हें संभवत: आस-पास कोई जानता भी नहीं था। यहाँ उन्हें आये भी दो-तीन दिन ही हुए हैं और वे साधारण साधु की भांति मन्दिर के अतिथि हैं।

मन्दिर और मूर्तियों में उसे कोई आकर्षण हो, ऐसी बात नहीं। यों ही आज इधर घूमने आकर मन्दिर में चला आया था। पुजारीजी उससे परिचित हैं। एक कोने आसन लगाये महात्मा पर दृष्टि पड़ गयी। उसे आकर्षण जान पड़ा और समीप जाकर उसने दण्डवत प्रणाम किया। उसे ज्ञात हे कि वैष्णव साधुओं को इसी प्रकार प्रणाम किया जाता है। भूमि पर बैठने में अब उसे कोई हिचक नही होती।

'संभवत मेरे पूर्वकृत पाप बहुत ही प्रबल हैं।' भारतीय दार्शनिक सिद्धान्त उसे कण्ठ हो गये हैं। यों महात्माजी ने पहुँचते ही उसके अध्ययन एवं साधु-अन्वेषण के सम्बन्ध में बिना बताये ही जो कुछ कहा था, उस सिद्धि तथा चमत्कार की ओर उसने ध्यान नहीं दिया। उसके लिए अब वह साधारण वस्तु हो गयी थी।

'यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः' महात्माजी ने केवल श्रुति के एक मन्त्र की ओर संकेत भर किया।

'ओह, तब क्या वे दयामय मुझे अपनाना नहीं चाहते?' जैसे हृदय में एक प्रकाश हो गया हो। उसने समझ लिया की उसका भटकना व्यर्थ है। साधनों एवं अनुष्ठानों की कोई महत्ता नहीं। एक क्षण में उसे इतना कुछ प्राप्त हो गया, जितना दो वर्ष के अध्ययन तथा तीन-सवा तीन वर्ष के निरन्तर भ्रमण ने भी नहीं दिया था। मस्तक रख दिया उसने महात्माजी के चरणों में।

'तुमने कभी उसकी ओर देखा भी है? कभी उसे पुकारा है?' महात्माजी गम्भीर हो गये। 'माता कभी खेल में लगे बच्चे को उठाने नहीं दौड़ती। रोता, चिल्लाता और माँ-माँ पुकारता शिशु ही उसे आकर्षित करता है। तुम्हें यह भी जान लेना चाहिये कि माता को पुकारने के लिये न कोई विधि होती है और न नियम।'

उसके नेत्रों की बूंदे नहीं धारा चल रही थी। आज उसने पथ पाया था और पथ-प्रदर्शक के चरण छोड़ने की उसकी कोई इच्छा न थी।
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(4)
'यह तो कल्पना है, मानी हुई वस्तु है।' उसकी पुरानी पर्वतीय कुटी अब एक भव्य मन्दिर का रूप ले चुकी थी। खुब सुसज्जित था मन्दिर। बड़ी सुरूचीपूर्ण थी उसकी रचना। चारों ओर पुष्प-वाटिका तथा तुलसी-कानन सुशोभित हो रहा था। मन्दिर में मूर्ति के दोनों पार्श्वों की धुप-दानियों से सुगन्धित धूम्र उठ रहा था। सम्मुख स्वर्णदीप में पञ्चशिखाएँ जगमगा रही थी।रजत-आसन पर सुपूजित दक्षिणावर्त शंख रखा था और सजे रखे थे पूजा के रजत-पात्र। आसन के वस्त्र भी कौशय थे। द्वार पर का नीला मखमली पर्दा एक ओर सिकुड़ा टंगा था।

'मैं सत्य चाहता हूँ। कल्पना मुझे नहीं चाहिए।' गले में तुलसी की कंठी बांधे, भालपर ऊर्ध्वपुंड्र लगाये, पीतकौशय धोती एवं पीतोतरीय में वह गौरवर्ण स्वयं दूसरी देवमूर्ती बन गया था। आरती कर चुका था और नित्य की कंठस्थ प्रार्थनाओं का कर्म समाप्त हो गया था।

'मैंने समझा था, यह कल्पना ही मुझे सत्यतक पहुँचा देगी।' दण्डवत प्रणाम करने के पश्चात वह वहीं घुटनों के बल बैठ गया। बाहर की भीड़ को अारती और तुलसीदल देना आज वह भूल चुका था। लोगों ने देख लिया कि आज वह जल्दी मन्दिर से निकलता नहीं दीखता, तो धीरे-धीरे खिसकने लगे।

'मैं तुम्हें पुकारता हूँ - केवल तुम्हें।' व्याकुलता अपनी सीमापर पहुँच गयी थी 'मैं नहीं जानता कि तुम कौन हो। कैसे हो। यह जानने के लिए ही तो तुम्हें पुकारता हूँ। मैं उसे पुकारता हुँ, जो विश्व का आदि कारण है। जो मूलस्त्रष्टा है। जो सबका कारण है - सम्पूर्ण कारणों का परम कारण। मैं उसे जानना चाहता हूँ और इसीलिए उसे पुकारता हूँ।'

उसे पता नहीं लगा कि कब भगवान भास्कर ठीक मध्य क्षितिज पर पहुँचे, कब वे प्रतीची की ओर आकर्षित हुए और कब अपने साथ सम्पूर्ण अवनी को अरुणीमा के समुद्र में स्नान कराके उन्होंने अपने विश्राम-भवन के द्वार पर तमस की काली यवनिका गिरा दी।

उसे पता नही कि सेवकों ने उससे कब क्या आग्रह किया भय एंव संकोच भरे मन्द स्वर में। कब किसने धीरे से मन्दिर में प्रवेश करके प्रदीप जला दिये, यह भी वह नहीं जानता। उसने सबको मना जो कर दिया है कि जब वह भगवान के सम्मुख हो तो उससे कुछ न पुछा जाय। कुछ न कहा जाय, वह बैठा रहा नहीं, मूर्ति के चरणों में स्थिर नेत्र झरते रहे। लोगों ने आश्चर्य से देखा कि आज पहली बार वह पता नहीं, किस भाषा में क्या बड़बड़ा रहा है। कौन जानता था यहाँ उसकी मातृभाषा!

'तुम सुनोगे! तुम्हें सुनना होगा!' प्रार्थना की नम्रता प्रेमाग्रह में परिणत हो गयी। 'आज तुम्हें मेरी पुकार सुननी ही होगी! मैं बिना तुम्हें सुनाये यहाँ से अब नहीं उठता!' व्याकुलता ने चरम सीमा का अतिक्रमण किया।

अकस्मात उसके बंद नेत्र खुल गये। उसे लगा - किसी ने पलकों को पकड़कर नेत्र खोल दिये हैं। मन्दिर एक अलौकिक शीतल प्रकाश से जगमगा रहा था। उसे जान पड़ा - सिंहासन पर ललित त्रिभंगीं से खड़ी मुरलीधारी काले पत्थर की मूर्ति मन्द-मन्द मुसकरा रही है - सचमुच मुसकरा रही है। उसमें जीवन आ गया है। उसके ऊपर का पीताम्बर का पटुका हिल रहा है और...........

वह वैसे ही बैठा रहा वहाँ। एक दिन, दो दिन और तीसरे दिन शाम को सहसा हंसता हुआ उठ खड़ा हुआ। लोगों को लगा कि वह पागल हो गया है। मूर्ति को प्रणाम करने के बदले, सिंहासन पर चढ़कर अंकमाल दी उसने। बिना कुछ कहे-सुने वहाँ से चला गया।

हम प्रतिक्षा कर रहे हैं कि वह कोई वैज्ञानिक मार्ग बतावेगा विश्व को जीव, ईश्वर एवं धर्म के अनुसन्धान के सम्बन्ध में। लेकिन उसका तो पता ही नहीं है। क्या आप में से किसी ने उसे देखा है?

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 9

||श्री हरिः||
6 - भगवत्प्राप्ति

'मनुष्य जीवन मिला ही भगवान को पाने के लिए है। संसार भोग तो दूसरी योनियों में भी मिल सकते हैं। मनुष्य में भोगों को भोगने की उतनी शक्ति नहीं, जितनी दूसरे प्राणियों में है।' वक्ता की वाणी में शक्ति थी। उनकी बातें शास्त्रसंगत थी, तर्कसम्मत थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि उनका व्यक्तित्व ऐसा था जो उनके प्रत्येक शब्द को सजीव बनाये दे रहा था। 'भगवान को पाना है - इसी जीवन में पाना है।भगवत्प्राप्ति हो गई तो जीवन सफल हुआ और न हुई तो महान हानि हुई।'

प्रवचन समाप्त हुआ। लोगों ने हाथ जोड़े, सिर झुकाया और एक-एक करके जाने लगे। सबको अपने-अपने काम हैं और वे आवश्यक हैं। यही क्या कम है जो वे प्रतिदिन एक घंटे भगवच्चर्चा भी सुनने आ बैठते हैं। परंतु अवधेश अभी युवक था, भावुक था। उसे पता नहीं था कि कथा पल्लाझाड़ भी सुनी जाती है। वह प्रवचन में आज आया था और उसका हृदय एक ही दिन के प्रवचन ने झकझोर दिया था।

सब लोगों के चले जाने के बाद उसने वक्ता से कहा - 'मुझे भगवत्प्राप्ति करनी है, उपाय बतलाइये।' वक्ता बोले - 'बस, भगवान् को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होनी चाहिए, फिर घर के सारे काम भगवान की पूजा बन जाएंगे।' उसने कहा - 'महाराज! घर में रहकर भजन नहीं हो सकता। आप मुझे स्नेहवश रोक रहे हैं, पर मैं नहीं रुकूंगा।' इतना कहकर वक्ता को कुछ भी उत्तर देने का अवसर दिए बिना ही युवक तुरंत चल दिया।

'भगवान को पाना है - इसी जीवन में पाना है।' सात्विक कुल में जन्म हुआ था। पिता ने बचपन से स्त्रोतपाठादि के संस्कार दिये थे। यज्ञोपवीत होते ही त्रिकाल-संध्या प्रारंभ हो गई, भले पिता के भय से प्रारंभ हुई हो। ब्राह्मण के बालक को संस्कृत पढ़ना चाहिए, पिता के इस निर्णय के कारण कालेज की वायु लग नहीं सकी। इस प्रकार सात्विक क्षेत्र प्रस्तुत था। आज के प्रवचन ने उसमें बीज वपन कर दिया। अवधेश को आज न भोजन रुचा, न अध्ययन में मन लगा। उसे सबसे बड़ी चिंता थी - उसका विवाह होने वाला है। सब बातें निश्चित हो चुकी हैं। तिलक चढ़ चुका है। अब वह अस्वीकार करे भी तो कैसे और - भगवान को पाना है, इस बंधन में पड़े तो पता नहीं क्या होगा।

दिन बीता, रात्रि आयी। पिता ने, माता ने तथा अन्य कई ने कई बार टोका - 'अवधेश! आज तुम खिन्न कैसे हो?' परंतु वह, किससे क्या कहे। रात्रि में कहीं चिंतातुर को निद्रा आती है। अंत में जब सारा संसार घोर निद्रा में सो रहा था, अवधेश उठा। उसने माता-पिता के चरणों में दूर से प्रणाम किया। नेत्रों में अश्रु थे, किंतु घर से वह निकल गया।

'अवधेश का स्वास्थ्य कैसा है?' प्रातः जब पुत्र नित्य की भांति प्रणाम करने नहीं आया, तब पिता को चिंता हुई।

'वह रात को बाहर नहीं सोया था?' माता व्याकुल हुई। उन्होंने तो समझा था कि अधिक गर्मी के कारण वह बाहर पिता के समीप सोया होगा।

पुत्र का मोह - कहीं वह स्वस्थ, सुंदर, सुशील और गुणवान हो, मोह तो माता-पिता को कुरूप, क्षुद्र, दुर्व्यसनी पुत्र का भी होता है। विद्या-विनय सम्पन्न युवक पुत्र जिसका चला जाये, उस माता-पिता की व्यथा का वर्णन कैसे किया जाय। केवल एक पत्र मिला था - 'इस कुपुत्र को क्षमा कर दें! आशिर्वाद दें कि इसी जीवन में भगवत्प्राप्ति कर सकूँ।'
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'आपने यहां अग्नि क्यों जलायी?' वन का रक्षक रुष्ट था - 'एक चिंगारी यहां सारे वन को भस्म कर सकती है।'

'रात्रि में वन पशु न आवें इसलिए!' अवधेश - अनुभवहीन युवक, वह सीधे चित्रकूट गया और वहां से आगे वन में चला गया। उसे क्या पता था कि पहले ही प्रातः काल उसे डांट सुननी पड़ेगी। अत्यंत नम्रतापूर्वक कहा उसने - 'मैं सावधानी से अग्नि बुझा दूंगा।'

'बिना आज्ञा के यहाँ अग्नि जलाना अपराध है।' वन के रक्षक ने थोड़ी देर में ही अवधेश को बता दिया कि भारत के सब वन सरकारी वन-विभाग द्वारा रक्षित हैं। वहां अग्नि जलाने की अनुमति नहीं है। वहाँ के फल-कंद सरकारी सम्पत्ति हैं और बेचे जाते हैं। वन से बिना अनुमति कुछ लकड़ियां लेना भी चोरी है।

'हे भगवान!' बड़ा निराश हुआ अवधेश। वन में आकर उसने देखा था कि उसे केवल जंगली बेर और जंगली भिंडी मिल सकती है। वह समझ गया था कि ये भी कुछ ही दिन मिलेंगे, किंतु वैराग्य नवीन था। वह पत्ते खाकर जीवन व्यतीत करने को उद्यत था, परंतु वन में तो रहने के लिए भी अनुमति आवश्यक है। आज कहीं तपोवन नहीं है।

'आप मुझे क्षमा करें। मैं आज ही चला जाऊँगा।' वन-रक्षक से उसने प्रार्थना की। वैसे भी जंगली भिंडी और जंगली बेर के फल के आहार ने उसे एक ही दिन में अस्वस्थ बना दिया था। उसके पेट और मस्तक में तीव्र पीड़ा थी। लगता था कि उसे ज्वर आने वाला है।

'आप मेरे यहाँ चलें।' वन-रक्षक को इस युवक पर दया आ रही थी। यह भोला बालक तपस्या करने आया था - कहीं यह तपस्या का युग है। 'आज मेरी झोपड़ी को पवित्र करें।'

अवधेश अस्वीकार नहीं कर सका। उनका शरीर किसी की सहायता चाहता था। उनके लिए अकेले पैदल वन से चित्रकूट बस्ती तक जाना आज सम्भव नहीं रह गया था। 'यदि ज्वर रुक गया - कौन कह सकता है कि वह नहीं रुकेगा।' अवधेश तो कल्पना से ही घबरा गया। उसने सोचा ही नहीं था कि वन में जाकर वह बीमार भी पड़ सकता है।
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'आप मुझे अपनी शरण में ले लें।' बढ़े केश, फटी-सी धोती, एक कई स्थानों से पिचका लोटा - युवक गौरवर्ण है, बड़े-बड़े नेत्र हैं, किंतु अत्यंत दुर्बल है। सम्भ्रांत कुल का होने पर भी लगता है कि निराश्रित हो रहा है। उसने महात्मा के चरण पकड़ लिये और उनपर मस्तक रखकर फूट-फूटकर रोने लगा।

'मुझे और सारे विश्व को जो सदा शरण में रखता है, वही तुम्हें भी शरण में रख सकता है।' ये महात्माजी प्रज्ञाचक्षु हैं। गंगाजी में नौका पर ही रहते हैं। काशी के बड़े से बड़े विद्वान भी बड़ी श्रद्धा से नाम लेते हैं इनका। इन्होंने युवक को पहचाना या नहीं, पता नहीं किंतु आश्वासन दिया - 'तुम पहले गंगा स्नान करो और भगवत्प्रसाद लो। फिर तुम्हारी बात सुनूंगा।'

'आप मुझे अपना लें। मेरा जीवन व्यर्थ नष्ट हो रहा है।' युवक फूट-फूटकर रो रहा था - 'मुझे नहीं सूझता कि मुझे कैसे भगवत्प्राप्ति होगी।'

'तुम पहले स्नान-भोजन करो।' महात्मा ने बड़े स्नेह से युवक की पीठ पर हाथ फेरा - 'जो भगवान को पाना चाहता है, भगवान स्वयं उसे पाना चाहते हैं। वह तो भगवान को पायेगा ही।'

युवक ने स्नान किया और थोड़ा सा प्रसाद शीघ्रतापूर्वक मुख में डाल कर गंगाजल पी लिया। उसे भोजन-स्नान की नहीं पड़ी थी। वैराग्य सच्चा था और लगन में प्राण थे। वह कुछ मिनटों में ही महात्माजी के चरणों को पकड़कर उनके समीप बैठ गया।
'पहले तुम यह बताओ कि तुमने अबतक किया क्या?' महात्माजी ने तनिक स्मित के साथ पूछा।

'बडा़ लम्बा पुराण है।' अवधेश - हां, वह युवक अवधेश ही है - यह आपने समझ लिया होगा। उसने अपनी बात प्रारंभ की। उसने बताया कि वह खूब भटका है इधर चार वर्षों में। उसे एक योगी ने नेती, धोती, न्यौली, ब्रह्मदांतौन तथा अन्य अनेक योग की क्रियाएँ करायी। उन क्रियाओं के मध्य ही उसके मस्तक में भयंकर दर्द रहने लगा। बड़ी कठिनाई से एक वृद्ध संत की कृपा से वह दूर हुआ। उन वृद्ध संत ने योग की क्रियाएँ सर्वथा छोड़ देने को कह दिया।

'ये मूर्ख!' महात्माजी कुछ रुष्ट हुए - 'ये योग की कुछ क्रियाएँ सीखकर अपने अधूरे ज्ञान से युवकों का स्वास्थ्य नष्ट करते फिरते हैं। आज कहां है अष्टांग योग के ज्ञाता। यम-नियम की प्रतिष्ठा हुई नहीं जीवन में और चल पड़े आसन तथा मुद्राएँ कराने। असाध्य रोग के अतिरिक्त और क्या मिलता है इस व्यायाम के दूषित प्रयत्न में।'

'मुझे एक ने कान बंद करके शब्द सुनने का उपदेश दिया।' अवधेश ने महात्माजी के चुप हो जाने पर बताया - 'एक कुण्डलिनी योग के आचार्य भी मिले। मुझे घनगर्जन भी सुनाई पड़ा और कुण्डलिनी जागरण के जो लक्षण वे बताते थे, वे भी मुझे अपने में दीखे। नेत्र बंद करके मैं अद्भुत दृश्य देखता था, किंतु मेरा संतोष नहीं हुआ। मुझे भगवान नहीं मिले - मिला एक विचित्र झमेला।'

'अधिकारी के अधिकार को जाने बिना चाहे जिस साधन में उसे जोत दिया जाय - वह पशु तो नहीं है।' महात्माजी ने कहा - 'धारणा, ध्यान, समाधि - चाहे शब्दयोग से हो या लययोग से, किंतु जीवन में चांचल्य बना रहेगा और समाधि कुछ क्रिया मात्र से मिल जायगी, ऐसी दुराशा करनेवालों कहा क्या जाय। जो भगवद्दर्शन चाहता है उसे सिखाया जाता है योग....! भगवान की कृपा है तुम पर। उन्होंने तुम्हें कहीं अटकने नहीं दिया।'

'मैं सम्मान्य धार्मिक अग्रणियों के समीप रहा और विश्रुत आश्रमों में। कुछ प्रख्यात पुरुषों ने भी मुझपर कृपा करनी चाही।' अवधेश में व्यंग्य नहीं, केवल खिन्नता थी - 'जो अपने आश्रम-धर्म का निर्वाह नहीं कर पाते, जहाँ सोने-चाँदी का सेवन और सत्कार है, जो अनेक युक्तियां देकर शिष्यों का धन और शिष्याओं का धर्म अपहरण करने का प्रयत्न करते हैं, वहां परमार्थ और अध्यात्म भी है, यह मेरी बुद्धि ने स्वीकार नहीं किया।'

'कलियुग का प्रभाव - धर्म की आड़ में ही अधर्म पनप रहा है।' महात्माजी में भी खिन्नता आयी - 'जहाँ संग्रह है, विशाल सौध हैं, वहां साधुता कहाँ है। जहाँ सदाचार नहीं, इन्द्रियतृप्ति है, वहाँ से भगवान या आत्मज्ञान बहुत दूर है। परंतु इतनी सीधी बात लोगों की समझ में नहीं आती। सच तो यह है कि हमें कुछ न करना पड़े, कोई आशिर्वाद देकर सब कुछ कर दे, इस लोभ से जो चलेगा वह ठगा तो जायगा ही। आज धन और नारी का धर्म जिनके लिए प्रलोभन हैं, ऐसे वेशधारियों का बाहुल्य इसीलिए है। ऐसे दम्भी लोग सच्चे साधु-महात्माओं का भी नाम बदनाम करते हैं।

'मैं करने को उद्यत हूँ।' अवधेश ने चरणों पर मस्तक रखा - 'मुझे क्या करना है, यह ठीक मार्ग आप बताने की कृपा करें।'

'घर लौटो और माता-पिता को अपनी सेवा से संतुष्ट करो।' महात्माजी ने कहा - 'वे चाहते हैं तो विवाह करो। घर के सारे काम भगवान की पूजा समझकर करो - यही तो उस वक्ता ने तुमसे कहा था।

'देव!' अवधेश रो उठा।

'अच्छा, आज अभी रुको।' महात्माजी कुछ सोचने लगे।
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'ये पुष्प अंजलि में लो और विश्वनाथजी को चढ़ा आओ।' प्रातः स्नान करके जब अवधेश ने महात्माजी के चरणों में मस्तक रखा, तब महात्माजी ने पास रखी पुष्पों की डलिया खींच ली। टटोलकर वे अवधेश की अंजलि में पुष्प देने लगे। बड़े-बड़े सुंदर कमल पुष्प - थोड़े ही पुष्पों से अंजलि पूर्ण हो गई। महात्माजी ने खूब ऊपर तक भर दिये पुष्प।

असीघाट से अंजलि में पुष्प लेकर नौका से उतरना और उसी प्रकार तीन मील दूर विश्वनाथजी आना सरल नहीं है। परंतु अवधेश ने इस कठिनाई की ओर ध्यान नहीं दिया। वह पुष्पों से भरी अंजलि लिए उठा।

'कोई पुष्प गिरा तो नहीं?' महात्माजी ने भरी अंजलि से नौका में पुष्प गिरने का शब्द सुन लिया।

'एक गिर गया।' अवधेश का स्वर ऐसा था जैसे उससे कोई बड़ा अपराध हो गया हो।

'कहाँ गिरा, गंगाजी में?' फिर प्रश्न हुआ।

'नौका में' अवधेश खिन्न होकर बोला - 'मैं सम्भाल नहीं सका।'

'न विश्वनाथ को चढ़ सका, न गंगाजी को।' महात्माजी ने कहा - 'अच्छा, अपनी अंजलि के पुष्प मुझे दे दो।'

अवधेश ने महात्माजी की फैली अंजलि में अपनी अंजलि के पुष्प भर दिये। महात्माजी ने कहा - 'बाबा विश्वनाथ!' और सब पुष्प वहीं नौका में गिरा दिये।

'भैया, ये पुष्प विश्वनाथजी को चढ़ गए?' पूछा महात्माजी ने।

'चढ़ गए भगवन।' अवधेश ने मस्तक झुकाया।

'बच्चे! तू जहाँ है, भगवान तेरे पास ही हैं। वहीं तू उनके श्रीचरणों पर मस्तक रख।' महात्माजी ने अबकी कुछ ऐसी बात कही जो भली प्रकार समझ में नहीं आयी।

'वहां किनारे एक कोढ़ी बैठता है।' साधु होते ही विचित्र हैं। पता नहीं कहां से कहां की बात ले बैठे महात्माजी।
'वह बैठा तो है।' इंगित की गयी दिशा में अवधेश ने देखकर उत्तर दिया।

'देख, वह न नेती-धोती कर सकता, न कान बंद कर सकता और न माला पकड़ सकता।' महात्माजी समझाने लगे - 'वह पढ़ा-लिखा है नहीं, इसलिए ज्ञान की बात क्या जाने। परंतु वह मनुष्य है। मनुष्य जन्म मिलता है भगवत्प्राप्ति के लिए ही। भगवान ने उसे मनुष्य बनाया, इस स्थिति में रखा। इसका अर्थ है कि वह इस स्थिति में भी भगवान को तो पा ही सकता है।'
'निश्चय पा सकता है।' अवधेश ने दृढ़तापूर्वक कहा।

'तब तुम्हें यह क्यों सूझा कि भगवान घर से भागकर वन में ही जानेपर मिलते हैं।' महात्माजी ने हाथ पकड़कर अवधेश को पास बैठाया - 'क्यों समझते हो कि गृहस्थ होकर तुम भगवान से दूर हो जाओगे। जो सब कहीं है, उससे दूर कोई हो कैसे सकता है।'
'मैं आज्ञा पालन करुंगा।' अवधेश ने मस्तक रखा संत के चरणों पर। उसका स्वर कह रहा था कि कुछ और सुनना चाहता है - कोई साधन।

'भगवान साधन से नहीं मिलते।' महात्माजी बोले - 'साधन करके थक जाने पर मिलते हैं। जो जहां थककर पुकारता है - 'प्रभो! अब मैं हार गया, वहीं उसे मिल जाते हैं। या फिर उसे मिलते हैं जो अपने को सर्वथा उनका बनाकर उन्हें अपना मान लेता है।'
'अपना मान लेता है?' अवधेश ने पूछा।

'संसार के सारे संबंध मान लेने के ही तो हैं।' महात्माजी ने कहा - 'कोई लड़की सगाई होते ही तुम्हें पति मान लेगी और तुम उसके पति हो जाओगे। भगवान तो हैं सदा से अपने। उन्हें अपना नहीं जानते, यह भ्रम है। वे तुम्हारे अपने ही तो हैं।'

'वे मेरे हैं - मेरे भगवान।' पता नहीं क्या हुआ अवधेश को। वह वहीं नौका में बैठ गया - बैठा रहा पूरे दिन। लोग कहते हैं - कहते तो महात्माजी भी हैं कि अवधेश को एक क्षण में भगवत्प्राप्ति हो गई थी।

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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4 - मनुष्य क्या कर सकता है?

'पशुपतिनाथ। मुझ अज्ञानीको मागे दिखाओ।' उस ठिगने किन्तु सुपुष्ट शरीर वृद्ध के नेत्र भर आये। उसके भव्य भाल पर कदाचित ही किसीने कभी चिन्ता की रेखा देखी हो। विपत्ति में भी हिमालय के समान अडिग यह गौरवर्ण छोटे नेत्र एवं कुछ चपटी नाक वाला नेपाली वीर आज कातर हो रहा है -'भगवान । मुझे कुछ नहीं सूझता कि क्या करूं। मनुष्य को तुम क्यों धर्मसंकट में डालते हो? तुम्हें पुकारना छोड़कर मनुष्य ऐसे समय में और क्या करे? तुम बताओ, मुझे क्या करना चाहिये हैं?'

आँसू की बुंदें चौड़ी हड्डी वाले सुदृढ़ कपोलों पर से लुढ़क कर उजली मूछों में उलझ गयी। अपनी हुंकार से वन के नृशंस व्याघ्र को भी कम्पित कर देने वाला वज्र-पुरुष आज बालक के समान रो रहा था। उसकी कठोर काया के भीतर इतना सुकोमल ह्रदय है - उससे परिचित प्रत्येक व्यक्ति इसे जानता है।

नरेन्द्र सिंह वीर है - मृत्यु के मुख में भी पैर रख कर खुखड़ी के दो हाथ झाड़ देने का हौसला रखता है हृदय में, लेकिन धार्मिक है। आप उसे धर्मभीरु भी कहे तो चलेगा और आज वह धर्मभीरु घर्म-संकट में पड़ गया है। अब अपने पशुपतिनाथ को - नेपाल के आराध्य देव को पुकार रहा है वह।

'एक ब्राह्मण आशा लेकर गोरखे की शरण आया है। उसने मुझ पर विश्वास किया है। वह दुखी है - विवश है। दो पुत्रियाँ हैं उसके घर में विवाह करने योग्य और घर पर पुरुष तो दूर, उसकी पत्नी भी जीवित नहीं। फफक पड़ा नरेंन्द्र सिंह - 'वह मारा जा सकता है। क्रूर विदेशी उसे कुत्ते के समान गोली से भून देंगे। एक गोरखा यह विश्वासघात करे? नरेंन्द्र यह ब्रह्महत्या ले? मेरे नाथ ! तुम कहाँ सो गये हो? समाधी छोड़ दो आशुतोष। इस सेवक को मार्ग दिखलाओ।'

'मैं इस चौकी का रक्षक हूँ। चौकी के सैनिक मेरे भरोसे निश्चिन्त रहते हैं। मेरे महाराज मुझ पर विश्वास करते हैं। एक नेपाली अपने देश से अपने महाराज से विश्वासघात करे?' नरेन्द्र सिंह ने दोनों हाथ सिर पर पूरे वेग से पटक दिये - 'फिरंगी पता नहीं क्या चाहते हैं। वे रहस्य पाकर पता नहीं क्या अनर्थ करेंगे। चौकी के सैनिक भून जायेंगे और उन पिशाचों के लिये गौ, ब्राह्मण, देवता - वे तो हैं ही पिशाच। सतियों का सतीत्व उनके लिये विनोद का साधन है। मैं निमित्त बनूं उनकी पैशाचिकता को सफल बनाने में? मैं अपने देश से, महाराज से अनुगतों से, समाज से, और धर्म से ही विश्वासघात करूं?'

वृद्ध जैसे पागल हो जायगा। उसने मस्तक पटक दिया पृथ्वी पर - 'पशुपतिनाथ। तुम मुझे मार्ग नहीं दिखलाते तो मर जाने दो।' अपनी खुखड़ी उसने म्यान से खींच ली। ललाट पर एक लाल गोल सूजन आ गयी थी; किन्तु जो मृत्यु का आलिंगन करने जा रहा है उसे उसका क्या पता लगना था।

'गायें मारी जायँगी - नेपाल की इस पावन धरापर, भगवान तथागत के चरणों से पूत हुई इस पृथ्वी पर गोरक्त गिरेगा। मेरी बेटियों-बहुओं का सतीत्व फिरंगी सिपाही लूटेंगे या वे अपनी रक्षा के लिये खुखड़ी खोंस लेंगी हृदय में।' नरेन्द्र सिंह के हाथ से अपनी खुखड़ी छूट गिरी - 'मुझे मरने का अधिकार कहां है। मेरी मृत्यु का अर्थ भी तो शत्रु को सुविधा देना ही होगा। हाय । आज यह अधम मर भी नहीं सकता है।'

'अतिथि के साथ विश्वासघात - ब्राह्मण की हत्या। उसकी वे कुमारी कायाएँ।' नरेन्द्र सिंह को आखों के आगे अन्धकार छा गया। उसने उस स्वरमें, जिसमें किसी नृशंस हत्यारे के छुरे से आहत मरणोन्मुख प्राणी चीत्कार करता है - चीत्कार की- 'पशुपतिनाथ।'

आर्त प्राणों की कातर पुकार वह आशुतोष चन्द्रमौलि न सुने - ऐसा कभी हुआ है? जिस दिन वह गंगाधर सच्ची पुकार सुनने के लिए भी समाधीमग्न बनेगा, सृष्टि रहेगी कितने पल?

नरेन्द्र के मुख पर शान्ति आयी। उसने नेत्र पोंछ लिये हाथों से ही खुखड़ी उठाकर म्यान में रख ली। उसके हृदय के पशुपतिनाथ ने उसे प्रकाश दे दिया था। दृढ़ निश्चय था उसके मुखपर।

'पण्डितजी! आप मुझे क्षमा करें।' जब वह अथिति के सम्मुख आया, उसके स्वर में कोई हिचक या कंपन नहीं थी। 'आपके खींचे मानचित्र मैं आपको लौटा नहीं सकूंगा। आपको काठमाण्डू जाना है।'

'नरेन्द्र सिंह। तुम विश्वासघात करोगे? तुम?' ब्राह्मण के नेत्र फटे-फटे हो गये। उसका मुख भय से सफेद पड़ गया - 'फिरंगी मेरी कन्याओं की क्या दुर्गति करेगा - सोचो तो तुम। मैं यहीं प्राण दे दूंगा। तुम्हें ब्रह्महत्या लेनी है?'

'मैं विवश हुँ।' नरेन्द्र सिंह ने मुख नीचे झुका लिया। ब्राह्यण के स्वरमें जो प्राण दे देने की दृढ़ता थी - दूसरा कोई मार्ग भी नहीं था उनके लिये। लेकिन नरेन्द्र ने उन्हें उसी स्थिर स्वर में कह दिया - 'यहाँ आपको प्राण देने नहीं दिया जा सकता। काठमाण्डू तो जाना ही है आपको। पशुपतिनाथ को प्रणाम करके जो कुछ करना आप चाहें - स्वतन्त्र रहेंगे।'
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(2)
अंग्रजों ने नेपाल पर चढाई तो कर दी, किंतु उन्हें अब छठी का दूध याद आ रहा है। उनकी बंदूकों की पिट्- पिट् गोरखा वीरों के पत्थर-कले के आघात के सम्मुख व्यर्थ सिद्ध हो रही है। इन जंगलों और पहाड़ों में आकर फिरंगी अपनी हेकड़ी भूल गया है। अब तो उसे यह समझ आने लगी है कि किसी प्रकार सम्मान सुरक्षित रखकर सन्धि हो जाना भी बड़ी बात है।

'चाहे जो हो कुछ चौकियों पर अधिकार स्थापित ही करना होगा।' स्थानीय कर्नल क्या करे? 'ऊपरवाले तो आदेश देना ही जानते हैं। यहाँ वस्त्रों के शिविरों में रात-दिन रहना पडे़ और सियार पत्थर-कले से छूटे पाषाण खण्ड तोपों के गोलों की भांति घहरायं तो पता लगे।' लेकिन कर्नल चाहे जितना असंतुष्ट होकर बड़बड़ाये और पैर पटके; ऊपरवालों के आदेशों को पूरा किये बिना उसके लिये भी कोई मार्ग नहीं है।

'हमें एक मानचित्र मिल जाय इस अगली गोरखा चौकी का।' कर्नल चिन्ता में पड़ गया। सामने छोटी-सी पहाड़ी है। घना जंगल है। जब सेना आगे बढ़ने का प्रयत्न करती है, पहाड़ी के ऊपर से पत्थरों की बौछार प्रारम्भ हो जाती है। कुछ का कचूमर निकल जाता है। अपना-सा मुँह लेकर लौटना पड़ता है। छोटा-सा घेरा है पहाड़ी पर बहुत छोटे घर जितना। उसमें कितने गोरखे सैनिक होंगे? कहाँ से वे जल और भोजन पाते हैं? उनका मार्ग क्या है?'

इतिहास देश के इस दुर्भाग्य का साक्षी है कि देशवासी ही सदा आक्रमणकारियों के सहायक हो गये हैं। उस अंग्रेज दुकड़ी के साथ संख्या में देशी सैनिक ही अधिक थे। उन्होंने पता लगाना प्रारम्भ किया। अन्त में कर्नल को सूचना मिली - 'नीचे गाँव में एक ब्राह्मण है। वे मानचित्र बनाना अच्छा जानते हैं। कई नरेशों के यहाँ इस काम पर रह चुके हैं। इस समय अर्थ-संकट में हैं। अगली पहाड़ी के पीछे तो गांव है, उसका सरदार पण्डितों को बहुत मानता है। काठमाण्डू तक भी उनका आना जाना है।'

'हम तुम्हें बहुत रुपया देंगे - दो हजार रुपया।' कर्नल के आदेस से पण्डितजी बुलवाये गये - पकड़ मंगाये गये कहना चाहिये। 'तुम इस पहाड़ी और उसके आस-पास का एक मानचित्र हमें बनाकर दे दो। हमारी बात नहीं मानना बहुत बुरा होगा।'

'मैं इस पहाड़ी पर या उसके मार्ग से कभी नहीं गया हूँ।' पण्डितजी राजदरबारों के अनुभवी थे। कर्नल कितने अत्याचार कर सकता है, यह जानना उनके लिये कठिन नहीं था। धन का लोभ - लेकिन दो-दो कन्याओं का विवाह दरिद्रता के कारण एक सम्मान्य व्यक्ति के यहाँ रुका हो और उसे लोभ हो जाय तो दोष कैसे दिया जा सकता है। इतनेपर भी पण्डितजी पिंड छुड़ाना ही चाहते थे।

'तुम अब जा सकते हो। तुम्हें जाकर मानचित्र लाना ही है।' कर्नल ने धमकी दी। 'तुम्हारे घर पर हमारा एक सैनिक बराबर रहेगा। परसों शाम तक तुम नहीं आ गये मानचित्र लेकर तो हम तुम्हारे घर में आग लगवा देंगे और तुम्हारी लड़कियों को यहाँ पकड़ मंगायेंगे।'

कर्नलकी धमकी में जो क्रूरता-पैशाचिकता थी, उसने ब्राह्मण को कंपा दिया। मस्तक झुका कर वे चले गये। घर जाने का उनमें साहस नहीं था। कर्नल ने उन्हें कागज पेंसिल पकडा दी थी। वन पथ उनके लिये अपरिचित नहीं था।

दुर्भाग्य आता है तो सब ओर से आता है। पण्डितजी ने लगभग पुरा मानचित्र घूम-घामकर बना लिया था, किंतु उन्हें एक गोरखे सैनिक ने देख लिया। वह पहाड़ी चौकी से झरने पर सम्भवत: जल लेने आया था।

पाप में साहस नहीं हुआ करता। यह भी हो सकता है कि गोरखे सैनिक ने कुछ न समझा हो - उसने तनिक भी शंका न की हो। उसने पण्डितजी को पहचानकर स्वाभाविक ढंगसे ही पुकारकर प्रणाम किया हो। लेकिन पण्डितजी मानचित्र की रेखाएँ स्पष्ट कर रहे थे वृक्ष की छाया में बैठे। सैनिक का शब्द सुनते ही उनका तो रक्त सूख गया। कागज समेटा और भाग खड़े हुए। उन्हें लगा कि सैनिक ने उन्हें ही नहीं, उनके काम को भी देख लिया है। उसके प्रणाम में उन्हें स्पष्ट व्यंग्य का स्वर लगा। 'वह अपनी खुखड़ी या पत्थर-कला लेने गया होगा। अपने नायक को कहने या उनकी अनुमति लेने गया होगा। वह और उसके साथी आते होंगे।' बेचारे पण्डितजी के अपनी आशंका के कारण ही अधमरे हो गये थे।

'नरेन्द्र सिंह। मैं तुम्हारी शरण हूँ। मेरी रक्षा करो। पास के गाँव में पण्डितजी भागते-दौड़ते पहुंचे गये। उनका शरीर पसीने से लथपथ हो रहा था। वे हाफ रह थे और भय से काँप भी रहे थे - 'तुम वीर हो। ब्राह्यणकी रक्षा तुम्हारे हाथ में है।'

'आप इतने भयभीत क्यों हैं?' नरेन्द्र सिंह ने पूछा - 'फिरंगी तो इधर नहीं आ रहे हैं?'

'फिरंगी नहीं, तुम्हारे सैनिक।' पण्डितजी ने सब बातें सच-सच बता दी।

'मानचित्र देखूं तो।' नरेन्द्र ने मानचित्र ले लिया, किंतु उसके मन में ब्राह्यण से पूरा विवरण सुनकर तुमुल द्वन्द्व प्रारम्भ हो गया। वह घर के भीतर जाते-जाते बोला - 'आप विश्राम करें। यहां कोई आपको छू नहीं सकता।'

ब्राह्यण ने संतोष की साँस ली। वे पास बिछे पलंग पर बैठ गये। लेकिन नरेन्द्र सिंह - उसे मार्ग नहीं सूझ रहा था। वह व्याकुल हो रहा था - क्या करे वह? अब उसका कर्तव्य क्या है? यह ब्राह्मण - यह अतिथि - यह शरणागत......।
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(3)
'आप ब्राह्मण हैं, आपको मैं और क्या कहूँ।' हिंदू नरेशों का औदार्य ही तो है जो वे देवताओं के लिये भी कभी वन्दनीय माने जाते हैं। अपराधी ब्राह्यण देवता जब तीन सरकार (नेपालके प्रधानमंत्री) के सामने पहुँचाये गये, तब राणा ने उन्हें उठकर प्रणाम किया। 'आशा है मार्ग में आपको कष्ट नहीं हुआ होगा। सैनिकों ने आपके साथ सम्मान का व्यवहार किया होगा। आप हमें क्षमा करें इस अविनय के लिये। नायक नरेन्द्र सिंह का पत्र है कि वे यहां कल प्रात: पहुंचेगे। तब तक आप हमारा आतिथ्य ग्रहण करें।'

'आप मुझे प्राण दण्ड नहीं देंगे - यह मैं जानता हूँ। बाह्यण अवध्य है न! लेकिन मैं तो मर चुका। यह आपके सामने मेरा प्रेत खड़ा है। इसे मर-मिटने के लिये स्वतंत्र कर दीजिये!' ब्राह्मण के नेत्र लाल-लाल हो रहे थे - 'मेरा सम्मान नहीं रहा, मेरी लड़कियाँ फिरंगी ले ही गया होगा और वे पिशाच। हाय भगवान्! मैं अब क्यों जीवित हूँ?' दोनों हाथों अपने केश नोच लिये ब्राह्मण ने।

'आपकी पुत्रियाँ? फिरंगी?' महाराणा रुक-रुककर भी पूरे वाक्य बोल नहीं सके। स्थिति समझते ही उनके नेत्र भी अंगार हो उठे, किंतु दो ही क्षण में शान्त हो गये वे। 'महाराज! नरेन्द्र सिंह को आपके साथ आना चाहिये था। वह नहीं आया है। कल प्रात: वह यहाँ पहुँचेगा - उसने लिखा है तो पहुँचेगा ही। अब तक उसने एक बार भी झुठा आश्वासन नहीं दिया है। मैं समझता हूँ कि आपकी पुत्रियाँ सुरक्षित हैं।'

'सुरक्षित हैं वे?' बाह्यण को विश्वास नहीं हुआ।

'मैं भी केवल अनुमान कर रहा हूँ। कल प्रात: तक प्रतीक्षा कीजिये।' राणा ने गम्भीरता से कहा - 'नरेन्द्र सिंह चौकी से एक भी सैनिक हटा नहीं सकता। ऊपर के आदेश के बिना इतना दुस्साहस वह नहीं करेगा। उसके पास गाँव में कुल दस युवक और हैं और फिरंगी सेना बहुत बड़ी है।'

'वह क्या मेरी पुत्रियों को निकाल लाने वाले हैं?' ब्राह्मण को इसकी तनिक भी सम्भावना नहीं दीखती थी।
'भगवान पशुपतिनाथ जानते हैं।' राणा के पास भी कोई उत्तर नहीं था।
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नरेन्द्र सिंह दूसरे दिन प्रात:काल काठमाण्डू पहुँचे तो पहाड़ी टटुओं पर उनके साथ ब्राह्मण की दोनों पुत्रियाँ थी।

'धन्य वीर।' ब्राह्मण दौड़ा भुजाएँ फैलाकर।

'यह सम्भव कैसे हुआ?' राणा ने पूछा।

'मुझे भी पता नहीं।' नरेन्द्र सिंह ने भरें नेत्रों से कहा - 'मैं प्राण दे सकता था, वहीं देने गया था। मेरे दस साथी क्या कर लेते? लेकिन गांव तक पहुँचने में शत्रु मिला ही नहीं। वह सो रहा होगा। उसके सैनिक दौडे़ तब जब हम दो तिहाई मार्ग लौटते समय पार कर चुके थे। फिर हमारे पत्थर-कलों ने मृत्यु की वर्षा प्रारम्भ कर दी। करना तो जो कुछ था - पशुपतिनाथ को करना था, मनुष्य क्या कर सकता है?'

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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